अंचल कार्यालय की चौखट पर पैर रखते ही ऐसा लगता है मानो हम किसी सरकारी दफ्तर में नहीं, बल्कि मोक्ष प्राप्ति के किसी गुप्त केंद्र में आ गए हैं। यहाँ का देवता—यानी अंचलाधिकारी—साक्षात् ईश्वर का अवतार है, जो बिना भेंट चढ़ाए दर्शन तो क्या, फाइल की तरफ नजर भी नहीं करता।
सुना है विभाग के लोग हड़ताल पर हैं। वे कह रहे हैं कि उनके आत्मसम्मान को ठेस लगी है। कमाल है! जिन्हें यह तक याद नहीं कि ईमान किस चिड़िया का नाम है, उन्हें अचानक आत्मसम्मान की याद आ गई? असल में यह हड़ताल वेतन की नहीं, उस अतिरिक्त आय के अधिकार की रक्षा के लिए है, जिसके बिना उनके घर का चूल्हा तो क्या, गाड़ी का पेट्रोल भी नहीं जलता। उनके लिए भ्रष्टाचार कोई अपराध नहीं, बल्कि एक महान परंपरा है, जिसे वे बड़ी शिद्दत से निभा रहे हैं।
सरकार कह रही है कि वह सख्त है। निलंबन की गाज गिर रही है। लेकिन इस विभाग की जड़ें इतनी गहरी हैं कि ऊपर से टहनियाँ काटने से क्या होगा? यहाँ तो फाइल के साथ जब तक गांधी जी की मुस्कराहट न नत्थी हो, तब तक फाइल को लकवा मार जाता है। दाखिल-खारिज का खेल तो ऐसा है जैसे किसी प्यासे को रेगिस्तान में पानी का वादा करना। किसान अपनी जमीन के कागजों के लिए दफ्तर के इतने चक्कर लगाता है कि जमीन खुद शरमाकर अपना मालिकाना हक बदल दे, पर साहब का कलम बिना ईंधन के नहीं सरकता।
सच्चाई तो यह है कि यह पूरा विभाग एक ऐसा जादुई कुआँ है, जिसमें जनता का पसीना गिरता है और दूसरी तरफ से साहब की कोठियाँ और गाड़ियाँ निकलती हैं। अब जब सरकार ने इस कुएँ पर ढक्कन लगाने की कोशिश की है, तो प्यास अंचलाधिकारियों को
नहीं, बल्कि उस तंत्र को लगी है जो दशकों से जनता का खून पीकर मोटा हुआ है।
यह हड़ताल दरअसल उस अंधेर नगरी का विलाप है, जहाँ अब अचानक उजाला करने की धृष्टता की जा रही है। साहेब को पदोन्नति चाहिए, ताकि अब वे और ऊँचे पद पर बैठकर और सलीके से ‘सेवा’ कर सकें। आखिर भ्रष्टाचार भी तो एक कला है, और ये कलाकार अपनी कला की कद्र न होने से बेहद दुखी हैं।
हड़ताल आत्मसम्मान की या अवैध कमाई के अधिकार की ?
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