बिहार और उसके सीमावर्ती क्षेत्रों की वर्तमान राजनीति केवल सत्ता के हस्तांतरण का खेल नहीं है, बल्कि यह एक गहरे सामाजिक और वैचारिक संक्रमण का संकेत है। हालिया घटनाक्रम—नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना, सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना और राजद द्वारा ‘A to Z’ के नाम पर सवर्णों को साधना—दिखाते हैं कि बिहार पोस्ट-नीतीश युग में प्रवेश कर चुका है। लेकिन इस बदलाव के पीछे जो जमीनी हकीकत है, वह चिंताजनक है।
आज की राजनीति अब केवल अगड़ा बनाम पिछड़ा तक सीमित नहीं रही। रणनीतिकारों ने अब जातियों के भीतर सूक्ष्म-ध्रुवीकरण का जाल बिछा दिया है। हर छोटी उप-जाति के भीतर एक कृत्रिम पहचान का संकट पैदा किया जा रहा है। उन्हें यह डराया जाता है कि यदि वे अपनी विशिष्ट जातिगत पहचान के साथ संगठित नहीं हुए, तो उनका अस्तित्व खतरे में है। यह बांटो और राज करो की नीति का आधुनिक संस्करण है।
इस जाल को गहरा करने में सोशल मीडिया और राजनीतिक दलों के आईटी सेल की भूमिका निर्णायक है। डीप फेक और एल्गोरिदम के इस दौर में एक ऐसी सत्य से परे दुनिया बनाई जा रही है, जहाँ ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है। युवाओं को उनकी जाति के काल्पनिक गौरव और दूसरी जातियों के प्रति असुरक्षा के इको चैम्बर में बंद कर दिया गया है। मस्तिष्क भले ही आधुनिक तकनीक का उपयोग कर रहा हो, लेकिन चेतना पुरानी जातिगत संकीर्णताओं में कैद होती जा रही है।
क्या नई पीढ़ी इस जातिगत जाल से ऊब रही है? इसका उत्तर पेचीदा है। युवाओं के भीतर एक तीव्र छटपटाहट तो है, वे विकास और शुचिता चाहते हैं, लेकिन वे पारिवारिक और सामाजिक मोह के बंधनों से मुक्त होने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। सामाजिक बहिष्कार का भय और अपनों को नाराज न करने की मजबूरी उन्हें एक मूक दर्शक बना देती है। जब तक यह छटपटाहट व्यक्तिगत दायरे से निकलकर सामूहिक विद्रोह में नहीं बदलती, तब तक शुचितापूर्ण व्यवस्था एक सपना ही रहेगी।
इस अंधकारमय स्थिति में महर्षि अरबिंद का दर्शन प्रासंगिक हो जाता है। कोई भी बाहरी राजनीतिक परिवर्तन तब तक सार्थक नहीं होगा, जब तक कि मनुष्य के भीतर का अहंकार और संकीर्ण चेतना रूपांतरित नहीं होती। वर्तमान पतन शायद उस चरम बिंदु की ओर इशारा है, जिसके बाद ही पुनर्जागरण संभव होता है। जैसा कि कहा जाता है, “विनाश अक्सर सृजन की पूर्व शर्त होता है।”
बिहार की राजनीति आज एक चौराहे पर खड़ी है। एक तरफ जाति की बिसात है और दूसरी तरफ व्यवस्था परिवर्तन की दबी हुई पुकार। यदि हम और गिरने की ओर बढ़ रहे हैं, तो यह पतन ही शायद हमें उस स्थिति तक ले जाएगा जहाँ से ऊपर उठने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचेगा। वास्तविक राम किसी बाहरी शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना के जागरण और युवाओं द्वारा मोह के त्याग से ही प्रकट होगा।
डिजिटल युग में जाति का जाल: चेतना का पतन या नई शुरुआत ? एक विश्लेषण
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