2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 240 सीट तक लाने का जश्न विपक्ष ने अगले तीन महीने तक मनाया। ये वही वक्त था जब मोदी-शाह यह सुनिश्चित करने में जुटे थे कि ऐसा कोई परिणाम अब दोबारा कभी ना आ पाये।
चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई और बहुत हद तक न्यायपालिका भी। पूरा तंत्र जिस आक्रमकता और बेहयाई के साथ 2024 के नतीजों के बाद बीजेपी के साथ जिस तरह खड़ा हुआ, उससे यह लगभग तय हो गया कि बीजेपी अब सिर्फ वही चुनाव हारेगी जहां वो खुद चाहेगी। एकाध छोट-मोटे राज्य छोड़ देना और बात है, बंगाल बीजेपी कतई नहीं छोड़ना चाहेगी।
बंगाल में SIR के नाम पर जितने कोट काटे गये गये उनका हिसाब करें तो औसतन प्रति विधानसभा साढ़े सत्रह हज़ार वोट कम हुए हैं। विधानसभा चुनाव में इतने वोटों का क्या मतलब होता है, यह बताने की जरूरत नहीं है।
चुनाव आयोग के पास लगभग 27 लाख पुनर्विचार याचिकाएं आईं। इनमें से सिर्फ 139 लोगों का मतदान का अधिकार बहाल किया गया, बाकी में ज्यादातर मामले लंबित हैं। शिकायतों की सुनवाई के लिए जो ट्रिब्यूनल बनाये गये उनमें कुल 19 जज थे और सुनवाई के लिए अधिकतम दो हफ्ते का वक्त मिला। कुछ जगहों पर यह समय 8-10 दिन था।
आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि ट्रिब्यूनल कितने लोगों की सुनवाई कर पाया होगा। पूर्व जज, युद्ध में शामिल आर्मी के बड़े अधिकारी से लेकर समाज के कई प्रतिष्ठित लोगों तक ने ये दावा किया कि उनका नाम बिना किसी कारण वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है और तमाम कोशिशों के बावजूद मताधिकार बहाल नहीं हो पाया। आम आदमी का क्या हुआ होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
इस देश की राजनीतिक प्रक्रिया को बहुत तेजी से अप्रसांगिक बनाया जा रहा है। मणिपुर जल रहा है और देश के गृह मंत्री अपने दल-बल के साथ बाकी सारा काम छोड़कर अपनी पार्टी को चुनाव जिताने के लिए बंगाल में डटे हुए हैं। वोट का प्रतिशत, प्रो इनकंबेसी, एंटी इनकंबेसी, चुनाव के मुद्दे और वोटर का रूझान इन सब बातों पर चर्चा कम से कम मेरे लिए बेमानी है।
अगर बंगाल और असम में बीजेपी की उम्मीदों के अनुकूल परिणाम नहीं आता तो इसका सीधा मतलब ये है कि मोदी-शाह का दौर खत्म होने को है लेकिन मुझे फिलहाल ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा है। इन चुनाव नतीजों के बाद देश की राजनीतिक स्थिति पर नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता मुझे अपरिहार्य लग रही है।



