मसीहा: (ऊँचे मंच से, कैमरे की ओर देख कर)
भाइयों और बहनों! यह राष्ट्र अब रुकने वाला नहीं है। हमने इसे पुराने ज़माने के जंग लगे ताले-चाबी से आज़ाद कर दिया है। जो संपत्ति धूल फाँक रही थी, हमने उसे गतिशील बना दिया है। अब सब कुछ स्मार्ट होगा, सब कुछ ग्लोबल होगा। मैं तो बस एक निमित्त हूँ, मैं तो देश को परम वैभव पर ले जाने वाला एक माध्यम हूँ!
समझदार नागरिक: (नीचे भीड़ के किनारे खड़ा होकर, अपनी जली हुई बीड़ी सुलगाते हुए)
परम वैभव या परम विक्रय? हुज़ूर, जो चीज़ें हमारे पसीने से सींची गई थीं, उन पर आज किसी कॉर्पोरेट का स्टिकर लग गया है। आपने कहा था कि देश की मर्यादा बिकने नहीं देंगे, अब तो आलम यह है कि देश को बचाने के लिए कुछ बचा ही नहीं है, क्योंकि जो कीमती था, वह आपने पहले ही लीज़ पर चढ़ा दिया है।
मसीहा: (आवाज़ में बनावटी भारीपन लाते हुए)
यह विकास का अर्थशास्त्र है, मूर्ख! तुम नहीं समझोगे। संपत्ति का प्रबंधन ही भविष्य है। हम बेच नहीं रहे, हम तो शक्ति को पुनर्गठित कर रहे हैं। देखो, शेयर बाज़ार की ऊँचाई देखो, हमारी चमक देखो!
समझदार नागरिक: (धीमी हँसी के साथ)
बाज़ार की ऊँचाई तो देख रहा हूँ साहब, पर अपनी थाली की गहराई भी देख रहा हूँ। आपकी चमक ने हमारी आँखों के आगे अंधेरा कर दिया है। अजीब मसीहा हैं आप—मरीज़ का खून बेचकर उसे एनर्जी ड्रिंक पिला रहे हैं। और वो जो सामने बैठे हैं (विपक्ष की ओर इशारा करते हुए), वे तो ऐसे सोए हैं कि उनकी खर्राटों में भी आपकी ही धुन सुनाई देती है।
मसीहा: (क्रोध को मुस्कुराहट में दबाते हुए)
विपक्ष तो इतिहास का हिस्सा हो चुका है। अब तो केवल मेरा संकल्प और तुम्हारी श्रद्धा ही शेष है। जो मेरे साथ नहीं, वह राष्ट्र के साथ नहीं। बताओ, क्या तुम्हें यह भव्यता पसंद नहीं आ रही?
समझदार नागरिक: (सीधे मसीहा की आँखों में झाँकते हुए)
भव्यता बहुत है साहब, पर भव्यता में भय ज़्यादा है। साज़िश इतनी गहरी है कि जो समझ रहे हैं, उन्हें शोर दबा देता है, और जो नहीं समझ रहे, वे ढोल बजा रहे हैं। आपने देश को बेचने की ऐसी कला सीखी है कि खरीदने वाला भी खुद को दानवीर कह रहा है। पर याद रखिएगा, जब सब कुछ बिक जाएगा, तो बेचने के लिए सिर्फ आप और हम ही बचेंगे। तब बोली किसकी लगेगी?
नीलामी का शोर और मौन की गूंज
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