एक गुंडा सिर्फ एक गुंडा है। सौ गुंडे एक संगठन हैं और हजार गुंडे एक राजनीतिक दल हैं। राजनीतिक दल की पास अपरिमित संगठन की शक्ति होती है। संगठन में वह ताकत होती है कि जिसे चाहे, उसके घर में घुसकर तलाशी ले ले कि वह क्या खा रहा है। जिसे चाहे, भीड़ के हाथों लिंच करवा दे। उसके बाद लिंचिंग करने वालों को माला पहनाए, जनभावनाएँ भड़काए और वोट बटोर ले।
राजनीतिक संगठन में यह ताकत भी होती है कि दूसरों की जीवनशैली को लगभग अपराध साबित करने वाले उसके राजनेता जब मौका देखकर वैसी ही जीवनशैली अपनाएँ, तो उन पर फूल बरसाए जाएँ और उसी कर्म के आधार पर दोबारा वोट बटोर लिए जाएँ।
पोंगापंथ, पाखंड और फरेब नए भारत के आदर्श जीवन-मूल्य हैं और सबसे बड़ी संगठन-शक्ति वाली पार्टी बीजेपी इन जीवन-मूल्यों की इकलौती ध्वजवाहक है। भारतीय समाज को “गोली मारो सालों को” जैसा अमर वाक्य देने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने बंगाल के चुनाव के दौरान मंगलवार को सार्वजनिक रूप से मछली खाकर दिखाया और साथ ही यह ज्ञान भी दिया कि हर आदमी को अपनी पसंद का खाना खाने और धार्मिक मान्यताओं को अपनाने का हक होना चाहिए।
यही ज्ञान बीजेपी के नमूना सांसद मनोज तिवारी भी मछली की दावत उड़ाते हुए दे रहे हैं। आखिर रातों-रात यह ब्रह्मज्ञान बीजेपी नेताओं के पास कहाँ से आया कि जीवनशैली नितांत निजी मामला है? ऐसा इसलिए, क्योंकि बंगाल में मांसाहारियों के खिलाफ माहौल बनाकर वोट नहीं मिलेगा।
यहाँ भी वही तर्क अपनाया जा रहा है, जिसके आधार पर गाय पूरे देश में मम्मी और गोवा में यमी हो जाती है। पूर्वोत्तर के बीजेपी वाले गाय खाते हैं, इसलिए गाय वहाँ मिथुन है। मुझे याद है, बिहार के चुनाव के दौरान तेजस्वी यादव के मछली खाने का विजुअल आया था। इस राष्ट्रीय आपदा में अवसर ढूँढ़ते हुए देश के प्रधानमंत्री ने छाती पीटना शुरू किया और फिर बीजेपी समर्थक, आईटी सेल और ट्रोल आर्मी ने तेजस्वी यादव की कई दिनों तक ऑनलाइन लिंचिंग की।
मुद्दे देखिए, देश के सबसे बड़े राजनीतिक दल का व्यवहार देखिए और उसके बाद यह मानते हुए कुर्सी की पेटी बाँध लीजिए कि हम बहुत जल्द ही विकसित देश बनने वाले हैं। कश्मीर में प्लॉट मिल चुका, अगला अलॉटमेंट सीधे मंगल ग्रह पर होगा।



