अमेरिका का बड़ा दांव, क्या भारत के लिए बढ़ेगी मुश्किल?
Jharkhand Life News नई दिल्ली/वॉशिंगटन: रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच अमेरिका ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिसने भारत समेत दुनिया के कई बड़े देशों की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी संसद में दोनों प्रमुख दलों (रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक) के सांसदों ने एक नया संशोधित विधेयक पेश किया है। इस प्रस्ताव का मकसद रूस की तेल और गैस से होने वाली कमाई पर चोट करना है।
अगर यह विधेयक कानून बन जाता है, तो रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदने वाले देशों से अमेरिका आने वाले सामान पर 100% तक आयात शुल्क (टैरिफ) लगाया जा सकता है। इस सूची में भारत और चीन जैसे बड़े देश भी शामिल हैं।
क्या है नया प्रस्ताव?
इस साल की शुरुआत में इस विधेयक में 500% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव था। अब इसे संशोधित कर अधिकतम 100% तक कर दिया गया है। इसे भारत के लिए कुछ राहत जरूर माना जा रहा है, लेकिन 100% टैरिफ भी किसी बड़े झटके से कम नहीं होगा।
अमेरिकी सांसदों का कहना है कि रूस को तेल और गैस बेचकर जो बड़ी कमाई हो रही है, उसी से वह युद्ध जारी रखने में सक्षम है। इसलिए अब उन देशों पर आर्थिक दबाव बनाने की तैयारी है, जो रूस से सबसे ज्यादा ऊर्जा खरीद रहे हैं।
किन देशों पर पड़ सकता है असर?
रूसी कच्चे तेल के बड़े खरीदार
- भारत
- चीन
- स्लोवाकिया
- हंगरी
- अजरबैजान
इन देशों से अमेरिका जाने वाले सामान पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है।
रूसी प्राकृतिक गैस के बड़े खरीदार
- चीन
- फ्रांस
- जापान
- हंगरी
- बेल्जियम
हालांकि जिन देशों ने रूस पर अपनी गैस निर्भरता काफी कम कर दी है, उन्हें इस कानून में राहत देने का भी प्रावधान रखा गया है।
यूरोप को राहत, भारत-चीन पर ज्यादा फोकस क्यों?
अमेरिकी सांसदों का कहना है कि कई यूरोपीय देश रूस से ऊर्जा खरीद लगातार कम कर रहे हैं। इसलिए उन्हें कुछ छूट देने का प्रस्ताव रखा गया है।
लेकिन भारत और चीन अब भी रूस के सबसे बड़े तेल खरीदारों में शामिल हैं। अमेरिका का मानना है कि रूस की अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा सहारा इन्हीं देशों से मिल रहा है।
भारत पर क्या असर पड़ सकता है?
अगर यह कानून लागू होता है तो सबसे बड़ा असर भारत के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर पड़ सकता है।
इन क्षेत्रों को सबसे ज्यादा नुकसान होने की आशंका है—
- टेक्सटाइल उद्योग
- दवा (फार्मास्यूटिकल) उद्योग
- इंजीनियरिंग उत्पाद
- ऑटो पार्ट्स
- आईटी और टेक्नोलॉजी सेवाएं
100% टैरिफ लगने का मतलब होगा कि भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में बहुत महंगे हो जाएंगे। इससे निर्यात घट सकता है और कई उद्योगों पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत का रुख क्या है?
भारत लगातार कहता रहा है कि उसकी पहली प्राथमिकता ऊर्जा सुरक्षा और देश में महंगाई को नियंत्रित रखना है।
भारत का कहना है कि यदि रूस से रियायती कीमत पर तेल मिलता है तो वह अपने राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए खरीद जारी रखेगा। विदेश मंत्रालय और वित्त मंत्रालय पहले भी साफ कर चुके हैं कि भारत अपनी विदेश नीति और ऊर्जा नीति किसी बाहरी दबाव में तय नहीं करेगा।
क्या अभी से चिंता की जरूरत है?
फिलहाल नहीं।
यह केवल एक प्रस्तावित विधेयक है। इसे कानून बनने के लिए अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों से पारित होना होगा और फिर राष्ट्रपति की मंजूरी भी जरूरी होगी।
इसके अलावा इस विधेयक में राष्ट्रपति को ‘वेवर पावर’ भी दी गई है। यानी यदि अमेरिका को लगे कि भारत जैसे रणनीतिक साझेदार को राहत देना राष्ट्रीय हित में है, तो वह इन टैरिफ को अस्थायी रूप से टाल या माफ भी कर सकता है।
विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?
कई अमेरिकी रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत पर अत्यधिक आर्थिक दबाव डालना अमेरिका के लिए भी नुकसानदायक हो सकता है। इससे भारत रूस और चीन के और करीब जा सकता है, जो अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति के लिए चुनौती बन सकता है।
आगे क्या होगा?
अब सबकी नजर अमेरिकी संसद पर रहेगी। अगर यह विधेयक पास होता है तो भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर बड़ा असर पड़ सकता है। वहीं अगर राष्ट्रपति अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हैं, तो भारत को राहत भी मिल सकती है।
फिलहाल यह मामला सिर्फ तेल खरीद का नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी का भी बन चुका है।




