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मेरठ और नोएडा भारत के बारे में क्या बता रहे हैं?

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नेशनल मीडिया पर चुनाव का ढोल बज रहा है। चुनाव से अलग ईरान युद्ध में पाकिस्तान की ‘दलाली’ के विफल हो जाने का जश्न भी है। इन सबके बीच देश में बहुत कुछ ऐसा चल रहा है, जिसका जिक्र सिर्फ सोशल मीडिया पर है। दो खबरें बता रही हैं कि देश किधर जा रहा है।

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पहली खबर मेरे हिसाब से अपेक्षाकृत छोटी है। मेरठ में बरसों पुराने शॉपिंग मॉल, दुकानें और कुछ रिहाइशों पर बुलडोजर चल रहा है। पहली बार बहुत से लोगों को एहसास हो रहा है कि बुलडोजर नामक उपकरण का आविष्कार सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ इस्तेमाल के लिए नहीं हुआ था।

घोषित मोदी और योगी भक्त बिलख-बिलखकर रो रहे हैं, लेकिन उनके साथ कौन खड़ा है? आप बाकी बीजेपी वोटरों के बीच सर्वे करा लीजिए। मेरठ के दुकानदारों के लिए उनके मुँह से संवेदना के दो शब्द भी निकलेंगे? ज्यादातर लोग यही कहेंगे—गैर-कानूनी होगा, तभी टूट रहा है। जिस दिन उनके घर ऐसे किसी सरकारी फरमान की जद में आएँगे, तब चीख-चीखकर कहेंगे कि यह देश रहने लायक नहीं है।

देश की सामूहिक संवेदना अपने सबसे निचले स्तर का दायरा तोड़ चुकी है। आम बीजेपी वोटर को अपने पड़ोसी, सहकर्मी या रिश्तेदार से थोड़ा सा ज्यादा चाहिए और कुछ नहीं। यह बिग बॉस, नागिन और सास-बहू ड्रामों की खुराक पर पलने वाला समाज है, जिसके पास अपनी कोई राजनीतिक स्मृति या सामाजिक विवेक नहीं है और यह सिर्फ ईर्ष्या और कुंठा जैसी नकारात्मक भावनाओं से संचालित होता है। वर्तमान राजनीति इन्हीं भावनाओं के दोहन पर चल रही है।

एक समूह को दूसरे समूह के खिलाफ खड़ा करने के सिवा कुछ और नहीं हो रहा है। प्रधानमंत्री मोदी बिहार के चुनावी कैंपेन के दौरान तेजस्वी यादव को मछली खाने के लिए पानी-पीकर कोस रहे थे। वही प्रधानमंत्री बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को इस बात के लिए कोस रहे हैं कि उन्होंने बंगाल को मछली उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर नहीं बनाया और बेचारे बंगालियों को दूसरे राज्यों से सप्लाई होने वाली मछली खानी पड़ती है।

बंगाल का कैंपेन मुसलमानों के खिलाफ है, तो असम के कैंपेन के दौरान हिमंता बिस्वा शर्मा ने कई बार कहा कि उन्हें असमिया भाषी मुसलमानों से कोई शिकायत नहीं है, लेकिन बांग्ला बोलने वाले मुसलमानों को राज्य से निकाल बाहर करेंगे। क्या अब भी इस बात में कोई शक रह जाता है कि इस देश की मुख्य विभाजनकारी शक्ति कौन है?

अब लौटते हैं दूसरी खबर पर, जो वाकई बहुत बड़ी है। मेरठ से लेकर मानेसर तक मजदूरी बढ़ाए जाने की मांग को लेकर हज़ारों फैक्टरी वर्कर प्रदर्शन कर रहे हैं। ये प्रदर्शन कई दिनों से चल रहा था कि नोएडा में अचानक आंदोलन हिंसक हो गया। नाराज़ मजदूरों ने कुछ सरकारी गाड़ियों को आग लगा दी। रोहतक, नागपुर और कर्नाटक के औद्योगिक शहर मांड्या से भी ऐसे ही प्रदर्शनों की खबरें हैं।

विदेशी ताकत, टूलकिट और भारत की तरक्की से जलने वाले आदि-इत्यादि जैसी कहानियों की मैन्युफैक्चरिंग शुरू हो गई है।

मैंने कई प्रदर्शनकारियों के बयान सुने। पता चला कि उन्हें 11 हज़ार रुपये के आसपास सैलरी मिलती है और बदले में महीने के 30 दिन काम करना पड़ता है। अगर किसी बड़े शहर में रहते हों, तो आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि ड्राइवर और मेड कम श्रम में इनसे कहीं ज्यादा कमाते हैं। नए लेबर कोड के हिसाब से अकुशल मजदूरों का न्यूनतम वेतन 15,200 रुपये है।

भारत दुनिया का वह देश है, जहाँ पिछले एक दशक में आर्थिक असमानता सबसे तेज रफ्तार से बढ़ी है। भारत की कुल राष्ट्रीय संपत्ति के 40 फीसदी हिस्से पर केवल एक प्रतिशत सबसे अमीर लोगों का नियंत्रण है। दूसरी तरफ निचले पायदान पर खड़ी देश की 50 प्रतिशत आबादी का राष्ट्रीय संपत्ति में हिस्सा सिर्फ 6.4 फीसदी है। जीडीपी के मामले में भारत भले ही चौथे नंबर पर हो, लेकिन राजनेता-उद्योगपति गठजोड़ से बनी क्रोनी कैपिटलिस्ट इकॉनमी के रूप में अब उसका दर्जा पहला है।

घटनाएँ चीख-चीखकर इशारा कर रही हैं कि देश बारूद के ढेर पर बैठा है। क्या केंद्र सरकार अपनी विभाजनकारी राजनीति से वक्त निकालकर वास्तविक सवालों की तरफ देखने की जहमत उठाएगी?

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राकेश कायस्थ
राकेश कायस्थ
Media professional by occupation writer by heart

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