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हवाई स्वप्न और हवाई चप्पल…

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हवाई चप्पल वाला भी हवाई जहाज में बैठ सके, इसके लिए हवाई जहाज चाहिए। औऱ हवाई जहाज को उतरने के लिए हवाई अड्डा चाहिए। लेकिन हवाई अड्डा चल सके, इसके लिए यात्री चाहिए। और यहीं आकर सारा खेल बिगड़ जाता है। ●● देश में 2014 में करीब 74 ऑपरेशनल एयरपोर्ट थे। अब ये संख्या बढ़कर 160-164 के आसपास पहुंच गई है। जल्द ही 200 पार करने की बात चल रही है। ये आंकड़ा विकास की कथा तो बताता है। पर हकीकत कड़वी है। देश मे इनमें करीब 30 एयरपोर्ट ही प्रॉफिट में चल रहे हैं। अधिकांश पुराने हैं। बाकी या तो बमुश्किल ब्रेक-ईवन पर हैं, या भारी घाटे में। कई तो बिना किसी घोषणा के, उद्धघाटन के बाद से बन्द पड़े हैं ●● पाक्योंग, लुधियाना, पठानकोट, भावनगर, अंबिकापुर, राउरकेला, दतिया, कलबुरगी, कुशीनगर, अलीगढ़, आजमगढ़, मुरादाबाद, चित्रकूट, श्रावस्ती के लिए जगहों पर फ्लाइट बुक करने की कोशिश करें। नो फ्लाईट फाउंड!! कमर्शियल उड़ानें लंबे समय से ठप हैं। कई सौ करोड़ खर्च करके, लोगों की जमीनें लेकर, बड़े फनफेयर और इवेंट के साथ शुरू किए गए एयरपोर्ट, अब घोस्ट बिल्डिंग्स बन चुके हैं। ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट के रनवे पर घास उग रही है, ब्राउन फील्ड का मतलब टर्मिनल पर जमी धूल से है। लेकिन रखरखाव पर, टैक्सपेयर्स के करोड़ों रुपए पानी की तरह बह रहे हैं। ●● हिसार, मुजफ्फरपुर, कैलाशहर, दीसा, सोलापुर, टीजू जैसे कई एयरपोर्ट सिर्फ UDAN स्कीम की सब्सिडी की सांस पर जी रहे हैं। सब्सिडी की समयसीमा खत्म होते ही एयरलाइंस भाग जाएंगी। अयोध्या, देवघर, कानपुर जैसे कुछ शहर अपवाद हैं, जहाँ ठीकठाक टूरिज्म, कनेक्टिविटी और लोकल डिमांड है। इनके भविष्य में सस्टेनेबल की संभावना है। तो 90 नए एयरपोर्ट्स में, सफलता का प्रतिशत 5% से कम बैठता है। ●● ज्यादातर नए एयरपोर्ट चुनावी फायदे के लिए बने। वे कम यात्री सम्भावना , खराब रोड-होटल-टूरिज्म का इकोसिस्टम, और लोकल इकोनॉमी में धन की कमी के कारण खंडहर होने को अभिशप्त हैं। ●● UDAN स्कीम (उड़े देश का आम नागरिक) एयरलाइंस को शुरुआती सालों में सब्सिडी देती है ताकि छोटे शहरों में उड़ानें शुरू हों। ज्यादातर मामलों में एक-दो एयरलाइंस पर ही निर्भरता रहती है। जो छोटे, पुराने, अनकम्फर्टेबल विमान चलते हैं। बिलासपुर- इलाहाबाद जैसी फ्लाइट तो ऐसी हिलती हैं मानो पंख फड़फड़ा कर उड़ रही हों। ●● हवाई अड्डे सिर्फ कंक्रीट और रनवे से नहीं चलते। उन्हें चलाने के लिए असली इंजन चाहिए – यात्री!! वो जिसकी जेब मे पैसे हों। जिसे अपने वक्त की कीमत हो। और ऐसा तब होता है, जब इकॉनमी में जान हो। हर आदमी के पास करने को बहुत कुछ हो, और वक्त कम.. और इस समय थोड़े बहुत शहरों को छोड़, शेष भारत के पास वक्त बहुत है। करने को काम कम। ●● विकास वह, जो आम आदमी की जेब मे पैसे डाले। इकॉनमी को भीतर से उर्जा दे। एयरपोर्ट, हाइवे, तमाम इन्फ्रास्ट्रक्चर उस मस्कारा, क्रीम, पाउडर के मेकअप की तरह है, जो विदीर्ण चमड़ी को कैमरे के लेंस के सामने चमका सकती है। उसे युवा नही बना सकती। जब तक देश के नीति नियंता- और उन्हें वोट देने वाले, यह सत्य स्वीकारने को तैयार नही होंगे,आसमान में उड़ती चप्पलें, यूँ ही परकटे पक्षी की तरह सर पर गिरती रहेंगी

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Manish Singh
Manish Singhhttp://www.jharkhandlife.com
मनीष सिंह @REBORNMANISH के नाम से शानदार लिखते हैं, इनकी लेखन शैली धारदार और सटीक है, बहुत सारी हस्तियां इनकी लेखन-शैली के दीवाने हैं और व्यंग्य लेखन शैली की नई धारा पर पूरे फैक्ट के साथ लिखते हैं

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