सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई राज्यसभा का अपना कार्यकाल पूरा करके रिटायर हो गये। हर जगह खबर चल रही है कि अपने कार्यकाल के दौरान ना तो उन्होंने बहसों में हिस्सा लिया और ना सवाल पूछे।
जस्टिस गोगोई का राज्यसभा में आना ही एक सवाल था। एक ऐसा सवाल जो प्रश्नवाचक फंदे की तरह भारतीय लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था के गले में उस वक्त तक पड़ा रहेगा, जब तक ये व्यवस्थाएं जीवित रहेंगी।
मौजूदा दौर को सिर्फ मोदी युग कहा जाता है लेकिन यह दौर रंजन गोगोई, ज्ञानेश गुप्ता और अर्णब गोस्वामी युग भी उतना ही है।
कहानी शुरू होती है, सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर जजों के अचानक सड़क पर उतर आने के साथ। इन जजों ने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई और इल्जाम लगाया कि चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा मुकदमों के बंटवारे में मनमानी कर रहे हैं।
जस्टिस मिश्रा कुछ खास वजहों से कुछ केस एक या विशेष जजों को देते हैं। न्याय व्यवस्था के लिए यह स्थिति अत्यंत खतरनाक है। अगर हम जनता के सामने आकर अपनी बात नहीं रखते तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करता।
दीपक मिश्रा ‘न्यायप्रिय’ मुख्य न्यायधीश के रूप में अपार ‘यश’ बटोर चुके थे। कुछ समय बाद रंजन गोगोई चीफ जस्टिस बने तो देश ने यह माना कि इंसाफ की सबसे ऊंची कुर्सी पर अब एक ऐसा आदमी बैठ चुका है, जो अदालतों के गिरते हुए सम्मान की गहरी चिंता है और अब स्थितियां बेहतर होंगी।
अपने कार्यकाल के दौरान ही जस्टिस गोगोई पर सुप्रीम कोर्ट में काम करने वाली एक महिला ने यौन उत्पीड़न का इल्जाम लगाया। फिर खबर आई कि वह महिला गायब हो गई, शायद रहस्यमय परिस्थियों मे सस्पेंड कर दी गई है।
उसके कुछ समय बाद राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। फैसला आने से पहले बीजेपी लाखों की तादाद में छोट-छोटे बुकलेट छपवा चुकी थी कि निर्णय आने के बाद जनता में किस तरह तरह जाये और क्या कहें। ये बुकलेट पार्टी नेताओं से होते हुए पत्रकारों तक पहुंचने लगे थे। इससे साफ था कि पार्टी को पहले से पता है कि निर्णय क्या होगा।
विद्वान न्यायधीशों के खंडपीठ ने माना कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता जिससे माना जा सके कि बाबरी मस्जिद को राम मंदिर तोड़कर ही बनाया गया था। टाइटिल सूट पर हुई सुनवाई में सभी पक्षों की समुचित प्रशंसा करने के बाद खंडपीठ ने निर्णय दिया कि राम मंदिर उसी विवादित स्थल पर बनेगा और बाबरी मस्जिद के लिए अलग से पांच एकड़ जमीन दी जाएगी।
जस्टिस गोगोई इसके बाद बड़ी शान से रिटायर हुए, सस्पेंड की गई महिला के बारे में खबर आई कि उसकी नौकरी फिर से बहाल हो गई है। अवकाश ग्रहण करते ही राष्ट्रपति ने जस्टिस गोगोई को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत कर दिया। उनसे जब ये पूछा गया कि क्या ये भ्रष्ट्राचार का मामला नहीं है तो जस्टिस गोगोई ने बेफिक्री से जवाब दिया– भ्रष्टाचार करना ही होता तो क्या बदले में मैं इतनी छोटी चीज़ लेता।
आगे चलकर चीफ जस्टिस बने डी.वाई.चंद्रचूड़ ने एक इंटरव्यू में साफ किया कि राम जन्मभूमि की निर्णय प्रक्रिया में शामिल होते वक्त उन्हें ‘ ईश्वरीय प्रेरणा’ ने मदद दी। संघ के प्रिय ‘बुद्धिजीवी’ और नफरती भाषणों के लिए चर्चित रहे पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ जैसे लोगों ने जनसभाओं में खुलकर यह दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी खुद एक कागज लेकर जस्टिस गोगोई से मिले थे, जिसमें उनके कारनामों को कच्चा-चिट्ठा था। उसके बाद रामजन्मभूमि पर फैसला आया।
जो बातें अदालत के गलियारों में फुसफुसाहट के तौर पर सुनाई देती थी, वो सार्वजनिक हो गई। प्रशांत भूषण सरीखे लोग बकायदा खुलकर कह रहे हैं कि जजों की ब्लैकमेलिंग के लिए बीजेपी ने एक पूरा तंत्र बना रखा है।
इस दावे की प्रमाणिकता कोई साबित नहीं कर सकता लेकिन जस्टिस गोगोई के बाद से यह जरूर हुआ है कि अगर कोई ऊंची अदालत अगर अच्छी-अच्छी बातें करे तो जनता मान लेती है कि फैसला उसका ठीक उल्टा होगा।
अगर ईडी-सीबीआई को फटकार लगाई जाती है तो मान लिया जाता है कि महीनों से बंद किसी बेकसूर को बेल के लिए अभी और लंबा इंतज़ार करना पड़ेगा। अगर संविधान की आत्मा को बचाने की बात हो तो ये साफ हो जाता है कि ऐसा कोई फैसला जरूर ऐसा आएगा जिससे संविधान और देश का संघीय ढांचा कमज़ोर होंगे।
राम जन्मभूमि के बारे में लगातार मैं यह लिख रहा था कि अगर सरकार चाहे तो संविधान संशोधन जैसी किसी व्यवस्था से मंदिर बनवाने का रास्ता साफ कर सकती है। आपके एजेंडे में है, आप करवा लीजिये। 1990 को वक्त बहुत पीछे छूट चुका है लेकिन ऐसा लगता है कि इसके लिए जानबूझकर एक ऐसा रास्ता चुना गया जिससे इस देश के सर्वोच्च न्याय व्यवस्था हमेशा के लिए संदिग्ध हो गई।
जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा था कि वो सामने नहीं आते तो इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं कर पाता। क्या जस्टिस गोगोई अकेले में दिल पर हाथ रखकर अपने आप से पूछ पाएंगे कि क्या वो वाकई माफी के लायक हैं?



