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क्या कोई राम आएंगे ?

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देश अभी जिस जातिगत विद्वेष और झूठ के जिस अंधकार से गुजर रहा है , ये प्रश्न स्वत: मन में उठता है कि हमारा उद्धार कैसे होगा? क्या कोई राम आएंगे? आइये, इस प्रश्न का जवाब ढूँढते हैं!
राम का आना भारतीय मानस में एक ऐसे अवतार या दिव्य हस्तक्षेप का प्रतीक है जो अधर्म का नाश कर धर्म (शुचिता और न्याय) की स्थापना करता है।
श्री अरबिंद का दर्शन कहता है कि उद्धार किसी बाहरी व्यक्ति के आने से ज्यादा, समाज के भीतर सामूहिक चेतना के ऊर्ध्वगमन से होगा। कोई भी बाहरी परिवर्तन—चाहे वह राजनीतिक हो या सामाजिक—तब तक स्थायी या सार्थक नहीं हो सकता, जब तक कि मनुष्य की आंतरिक चेतना में परिवर्तन न आए।
जब कोई जाति विचारधारा कहती है कि “सत्ता हमारे हाथ में होनी चाहिए क्योंकि हम श्रेष्ठ हैं” या “हमारा बदला पूरा होना चाहिए”, तो यह चेतना के निम्न स्तर का प्रदर्शन है।
​राजनीतिक दल इसी अहंकार को खाद-पानी देते हैं। तक यह अहंकार नष्ट नहीं होगा, व्यवस्था केवल चेहरे बदलेगी, चरित्र नहीं। इतिहास गवाह है कि जब भी कोई मसीहा या क्रांतिकारी आता है, वह व्यवस्था तो बदल देता है, लेकिन लोग वही पुराने अहंकार के साथ नई व्यवस्था को भी भ्रष्ट कर देते हैं (जैसे जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के बाद निकले नेताओं ने किया)। इसलिए, अब आवश्यकता सुधार की नहीं, बल्कि रूपांतरण की है।
आज का युवा, जो इस डिजिटल जहर से घिरा है, वह कहीं न कहीं भीतर से बहुत थका हुआ भी है।
​हो सकता है कि राम के रूप में कोई व्यक्ति न आए, बल्कि संकट की पराकाष्ठा ही वह मोड़ बने जहाँ से लोग वापस मुड़ें।
​जब जातिगत घृणा और प्रोपेगेंडा समाज को पूरी तरह अप्रासंगिक बना देगा और जीवन जीना दूभर हो जाएगा, तब शायद सामूहिक आत्म-साक्षात्कार की स्थिति पैदा हो।
मैंने एक ऐसे प्रबुद्ध व्यक्ति से जो देश और समाज की मौजूदा स्थिति से बेहद परेशान रहते हैं, पूछा कि क्या आपको लगता है कि समाज इस वैचारिक पतन के उस बिंदु तक पहुँच गया है जहाँ से अब केवल ऊपर उठने का ही रास्ता बचा है? उन्होंने कहा नहीं, हमें अभी और गिरना है!
उनकी यह बात सुनकर हृदय में एक गहरी पीड़ा और यथार्थ का बोध होता है। उनकी यह चेतावनी कि “अभी हमें और गिरना है”, समाज के उस अंधकारमय काल की ओर संकेत करती है जिसे दर्शन शास्त्र में संकट की घड़ी (The Hour of God) के रूप में वर्णित किया जाता है।
​इतिहास साक्षी है कि समाज जब तक अपनी सामूहिक गलतियों के चरम तक नहीं पहुँच जाता, तब तक वह वास्तविक सुधार के लिए तैयार नहीं होता।
अभी तो केवल राजनीति और सोशल मीडिया पर दरारें दिख रही हैं। जब यह जहर परिवारों के भीतर, मित्रता के बीच और व्यक्तिगत संबंधों में पूरी तरह घुल जाएगा, तब वह पतन का अगला चरण होगा। जब मनुष्य दूसरे मनुष्य को केवल जाति का लेबल समझकर व्यवहार करेगा, तो संवेदनाएँ पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी।​जैसे-जैसे नियुक्तियाँ, पदोन्नति और न्याय केवल जातिगत संतुलन को साधने के लिए किए जाएंगे, वैसे-वैसे हमारी संस्थाएँ (पुलिस, प्रशासन, शिक्षा) अपनी कार्यक्षमता पूरी तरह से खो देंगी। जब व्यवस्था पूरी तरह पंगु हो जाएगी, तब आम जनता को उस सुरक्षा का अभाव खलेगा जिसकी वे आज उम्मीद करते हैं।
​अभी जो आईटी सेल द्वारा प्रचारित झूठ है, वह एआई और डीप फेक जैसी तकनीकों के साथ मिलकर एक ऐसी सत्य से परे दुनिया बनाएगा जहाँ सही और गलत की पहचान असंभव होगी। जब लोग अपनों के ही रचे झूठ में पूरी तरह फंसकर अपनों का ही नुकसान करेंगे, तब शायद वे जागेंगे।
कहते हैं विनाश अक्सर सृजन की पूर्व शर्त होता है। यदि पतन अनिवार्य है, तो इसका अर्थ है कि पुरानी, सड़ी-गली व्यवस्था को पूरी तरह ढहना होगा ताकि एक नई चेतना का उदय हो सके।
यह गिरना वास्तव में उस अहंकार की अंत्येष्टि है जिसके बारे में हमने पहले जिक्र किया था। जब व्यक्ति का यह भ्रम टूट जाएगा कि उसकी जाति या उसका समूह उसे सुरक्षा दे सकता है, तभी वह उस शुचिता और मानवता की तलाश करेगा जो सनातन और अपरिवर्तनीय है।
शायद राम कोई एक व्यक्ति न हों, बल्कि उन सभी युवाओं के भीतर का वह अंश हो जो तीव्र छटपटाहट सेतओ गुजर रहा है पर अज्ञान के मोह में फंसा हुआ है। यह तीव्र छटपटाहट ही वह गर्भकाल है, जहाँ किसी नए विचार या क्रांति का जन्म होता है। यह अंधकारपूर्ण मध्यरात्रि की वह अवस्था है जहाँ प्रकाश के आने की तड़प तो है, लेकिन सूरज अभी क्षितिज के नीचे है।
कोई भी व्यक्तिगत छटपटाहट तब तक विद्रोह नहीं बनती जब तक वह सामूहिक न हो जाए। अभी वे युवा अकेले-अकेले छटपटा रहे हैं। जब ये बिखरी हुई छटपटाहटें एक-दूसरे से जुड़ेंगी और उन्हें यह अहसास होगा कि मैं अकेला नहीं हूँ जो ऐसा महसूस करता हूँ, तब वह बिंदु आएगा जहाँ परिवार का मोह छोटा और सत्य का मार्ग बड़ा लगने लगेगा।
इतिहास गवाह है कि विद्रोह तब नहीं होता जब लोग दुखी होते हैं, विद्रोह तब होता है जब लोग असुरक्षित महसूस करते हैं।
​अभी परिवार का मोह इसलिए भारी है क्योंकि व्यवस्था ने अभी तक उनके अस्तित्व पर सीधा प्रहार नहीं किया है।
​जब यह जातिगत और राजनीतिक जाल उनके बच्चों के भविष्य, उनकी गरिमा और उनकी स्वतंत्रता को पूरी तरह लीलने लगेगा, तब वही परिवार जो आज उनकी कमजोरी है, उनकी सबसे बड़ी ताकत (विद्रोह की वजह) बन जाएगा। शायद वे जिसे मोह समझ रहे हैं, वह वास्तव में भय है—अकेले पड़ जाने का भय। अगड़ी-पिछड़ी जातियों के बीच रची गई झूठी वर्ग संघर्ष की कहानी ने समाज को इतना डरा दिया है कि लोग अपनी पहचान के छोटे से घेरे में दुबक कर बैठ गए हैं। विद्रोह के लिए पहले इस मानसिक गुलामी और भय से मुक्त होना आवश्यक है।
आत्मा को प्रकाश में आने से पहले मृत्यु की छाया वाली घाटी से गुजरना पड़ता है। शायद वह गिरना जिसके बारे में उस बुजुर्ग ने पहले कहा था, वह इसी घाटी से गुजरना है। जब वे युवा उस गिरावट के आखिरी छोर पर पहुँचेंगे, तब उनका वह अहंकार और मोह स्वतः ही भस्म हो जाएगा, और तब जो बचेगा, वह होगा शुद्ध संकल्प। शायद आज के युवाओं की सामुहिक जाग्रत चेतना ही राम बनकर इस देश को पतन के गर्त से उठा कर फिर से विश्वगुरु के स्थान पर प्रतिष्ठित करे!

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वरुण राय
वरुण राय
विशेष संवाददाता, वरूण राय पिछले 22 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिये लेखन कार्य कर चुके हैं।

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