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अस्मिता की ढाल बनाम छापेमारी की तलवार : बंगाल के प्रथम चरण का रण…

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कल 23 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में प्रथम चरण का मतदान होना है। सारे देश की निगाह इस चुनाव पर टिकी हुई है। कल तक जो स्तिथि बंगाल में थी उस आधार पर मतदाताओं के मूड को समझने की कोशिश करते हैं:-
बंगाल का मतदाता इस समय एक ऐसे अंतर्द्वंद्व से गुजर रहा है जहाँ एक तरफ शासन के प्रति नाराजगी है और दूसरी तरफ अपनी पहचान (अस्मिता) के खोने का डर।
​23 अप्रैल का सूरज जब उगेगा, तो वह इन 152 सीटों पर इसी अनिश्चितता का जवाब लेकर आएगा।
23 अप्रैल को ऊंट किस करवट बैठेगा, इसमें इसबार सुरक्षा बलों की अभूतपूर्व तैनाती का भी एक अहम किरदार होगा। सुरक्षा बलों की भूमिका केवल शांति व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह सीधे तौर पर मतदान के पैटर्न और साइलेंट वोटर के साहस को प्रभावित करेगी।
चुनाव आयोग ने पहले चरण की 152 सीटों के लिए 2,407 कंपनियों (लगभग 2,40,000 जवान) की तैनाती की है। यह किसी भी राज्य के विधानसभा चुनाव के एक चरण के लिए अब तक की सबसे सघन तैनाती मानी जा रही है।अकेले मुर्शिदाबाद में 316 और पूर्व मेदिनीपुर (नंदीग्राम वाला इलाका) में 273 कंपनियां तैनात की गई हैं।
यदि मतदान शांतिपूर्ण रहा, तो इसके दो बिल्कुल अलग परिणाम हो सकते हैं:
​भाजपा के लिए अनुकूल स्थिति: भाजपा का मानना है कि उनका वोटर’व् अक्सर हिंसा या डर के कारण घरों से बाहर नहीं निकलता। यदि केंद्रीय बल हर गली-नुक्कड़ पर मुस्तैद रहे और मतदाता को यह भरोसा हो गया कि वह बिना किसी डर के वोट दे सकता है, तो यह भाजपा के लिए फायदे की बात हो सकती है।
​टीएमसी के लिए चुनौती: तृणमूल कांग्रेस का बूथ मैनेजमेंट काफी हद तक उनके स्थानीय दबदबे पर टिका होता है। केंद्रीय बलों की अति-सक्रियता इस स्थानीय तंत्र को न्यूट्रलाइज कर सकती है। लेकिन यहाँ फिर वही अस्मिता वाला पेंच फंसता है—अत्यधिक सुरक्षा बलों की मौजूदगी को ममता बनर्जी दिल्ली का पहरा बताकर जनता की भावनाओं को और अधिक उकसा सकती हैं।
​सुरक्षा बल उस साइलेंट वोटर के लिए वह रास्ता आसान बना देते हैं। जब बूथ के अंदर केवल मतदाता और उसकी स्वतंत्र सोच होती है, और बाहर बंदूकों का सुरक्षा घेरा, तब मतदाता किसी भी दाम या दंड के प्रभाव से मुक्त होकर वोट देता है।
अगर कल का मतदान वास्तव में जीरो वायलेंस (शून्य हिंसा) वाला रहा, तो यह भाजपा की रणनीति की एक बड़ी जीत मानी जाएगी। लेकिन यदि इसके बावजूद वोटिंग प्रतिशत बहुत अधिक रहता है और ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की लंबी कतारें दिखती हैं, तो यह संकेत होगा कि अस्मिता और योजनाओं का असर सुरक्षा बलों की मौजूदगी से कहीं ज्यादा गहरा है।
हालांकि यदि हम बंगाली अस्मिता के भावनात्मक आवरण को हटाकर विशुद्ध रणनीतिक धरातल पर देखें, तो वर्तमान स्थिति भाजपा के पक्ष में एक अत्यंत सुव्यवस्थित घेराबंदी की ओर संकेत करती है। 13 अप्रैल को I-PAC के विनेश चंदेल की गिरफ्तारी और उसके बाद चुनावी मशीनरी के प्रमुख पुर्जों पर हुई छापेमारी महज दिखावा नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के बूथ मैनेजमेंट की रीढ़ तोड़ने का एक सचेत प्रयास है। राजनीतिक वास्तविकता यह है कि चुनाव के दिन ‘हवा’ से ज्यादा ‘संगठन’ मायने रखता है, और केंद्रीय एजेंसियों की निरंतर कार्रवाई ने सत्ताधारी दल के जमीनी कार्यकर्ताओं में एक किस्म की मनोवैज्ञानिक पंगुता पैदा कर दी है।
​उत्तर बंगाल और जंगलमहल की इन 152 सीटों पर भाजपा का आधार इस बार केवल मोदी लहर पर नहीं, बल्कि सत्ता विरोधी थकान (Anti-incumbency) और स्थानीय भ्रष्टाचार के ठोस प्रमाणों पर टिका है। संदेशखाली जैसी घटनाओं और शिक्षक भर्ती घोटाले के बाद, आम मतदाता के मन में अस्मिता से बड़ा सवाल अपनी सुरक्षा और भविष्य का खड़ा हो गया है। यहाँ भाजपा की ताकत यह है कि उन्होंने इस चुनाव को दीदी बनाम दिल्ली के बजाय ईमानदारी बनाम भ्रष्टाचार की लड़ाई में तब्दील करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। जब मतदाता टीवी पर नोटों के पहाड़ देखता है, तो अस्मिता का तर्क उसके खाली बटुए के सामने कमजोर पड़ने लगता है। इसके साथ ही, निर्वाचन आयोग द्वारा 58 लाख संदिग्ध मतदाताओं के नाम हटाना और केंद्रीय बलों की अभूतपूर्व तैनाती उस चुनावी इंजीनियरिंग को ध्वस्त कर सकती है जिसके भरोसे तृणमूल कठिन सीटों पर जीतती आई है।
​हालाँकि, इस विश्लेषण का दूसरा सिरा यह है कि ममता बनर्जी एक घायल शेरनी की तरह तब और अधिक आक्रामक हो जाती हैं जब उन्हें चारों ओर से घेर लिया जाता है। उनकी लक्ष्मी भंडार जैसी नकद हस्तांतरण योजनाएं ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार बन चुकी हैं, जिसे कोई भी छापेमारी आसानी से नहीं हिला सकती। लेकिन यदि हम 23 अप्रैल के मतदान का आकलन करें, तो भाजपा का पलड़ा उन क्षेत्रों में भारी दिख रहा है जहाँ संगठनात्मक रिक्तता पैदा हुई है। यदि साइलेंट वोटरों ने भ्रष्टाचार को अस्मिता से बड़ा मुद्दा मान लिया—जिसकी संभावना इस बार आंकड़ों में पहले से कहीं अधिक दिख रही है—तो भाजपा इन 152 सीटों में से बहुमत का आंकड़ा पार कर सकती है। अंततः, यह चुनाव इस बात का फैसला करेगा कि क्या एक मजबूत भावनात्मक नैरेटिव (अस्मिता) उस प्रशासनिक और कानूनी घेराबंदी (छापेमारी) को मात दे सकता है जिसने सत्ताधारी दल की घेराबंदी कर रखी है। फिलहाल, जमीनी पकड़ और रणनीतिक बढ़त के मामले में भाजपा एक कैलकुलेटेड एज (सटीक बढ़त) लेती हुई प्रतीत होती है।

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वरुण राय
वरुण राय
विशेष संवाददाता, वरूण राय पिछले 22 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिये लेखन कार्य कर चुके हैं।

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