प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान संकट की तुलना कोविड से की है। इसे लेकर अविश्वास से लेकर उपहास तक तरह-तरह की टिप्पणियां देखने को मिल रही है। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री के बयान पर थोड़ा रुककर सोचने की जरूरत है।
देश की अर्थव्यस्था की वास्तविक स्थिति का अंदाज़ा प्रधानमंत्री से बेहतर भला और किसे होगा? ये सच है कि इंडियन इकॉनमी लंबे समय से डाइनामाइट पर बैठी है और किसी भी वैश्विक आर्थिक उथल-पुथल का सामना करने की हालत में नहीं है।
इंटरनेशन एजेंसीज़ ने भारतीय अर्थव्यस्था को लेकर जो टिप्पणियां की है, वो नींद उड़ाने वाली है। गोल्डमैन सैश ने कहा कि भारत की जीडीपी अब 6 से नीचे रहेगी। इससे ज्यादा डराने वाली भविष्यवाणी मूडीज की है। मूडीज का कहना है कि ईरान संकट अगर खिंचा तो जीडीपी ग्रोथ रेट में 4 परसेंट तक की कमी आएगी। ध्यान रहे मूडीज 4 परसेंट तक की कमी की बात कर रहा है ना कि जीडीपी विकास दर के घटकर 4 परसेंट तक आने की।
मूडीज की मानें तो जीडीपी की दर जितनी भी है, उसमें सीधे-सीधे 4 प्वाइंट माइनस हो जाएगा। अब आता है, असली सवाल कि भारत की वास्तविक जीडीपी आखिर है कितनी? आंकड़े हमेशा से शानदार पेश किये जाते रहे हैं लेकिन इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर लगातार सवाल भी उठते रहे हैं। दावा 7 प्रतिशत तक के विकास दर का है लेकिन आईएमएफ तक का कहना है कि वह इस दावे का सत्यापन नहीं कर सकता है।
कॉरपोरेट सेक्टर में सरकारी आंकड़ों को लेकर अविश्वास की बातें दबी जुबान में की जा रही थी लेकिन अब कॉरपोरेट लीडर खुलकर बोलने लगे हैं। यह पूछा जा रहा है कि अगर जीडीपी वास्तव में 7 प्रतिशत के आसपास है, तो फिर वो देश की बड़ी कंज्यमूर कंपनियों के रिजल्ट में नज़र क्यों नहीं आ रहा है? आर्थिक विकास का ढोल पीटने वाली सरकार ने पिछले एक साल में जो कदम उठाये हैं, वो दावों से मेल नहीं खाते।
सरकार ने भारतीय बाजार में मांग सृजित करने के लिए पिछले एक साल में अपने सारे घोड़े खोल दिये।
आम आदमी की जेब में हाथ डालकर पाई-पाई निकाल लेने वाली सरकार ने इनकम टैक्स में कटौती की। उसके बाद बैक रेट और फिर जीएसटी तक में कटौती की गई। लेकिन इनका कॉरपोरेट रिजल्ट पर कोई असर दिखाई नहीं दिया।
इन सबके बीच आ गया ईरान संकट। रूपया बुरी तरह गिर रहा है और भारत को लंबे समय तक महंगा तेल खरीदना पड़ा तो सरकारी खजाने का बैंड बज जाएगा। चुनावी साल है, तो रेवड़ियां फिर से बांटी जाएंगी। ईंधन की कमी से महंगाई बेकाबू होगी और बहुत बड़े पैमाने छोटे रोजगारों में लगे लोगों के लिए रोजी-रोटी का संकट पैदा होगा।
ऐसे में कोविड जैसी परिस्थिति पैदा होने की प्रधानमंत्री की आशंका बिल्कुल वाजिब है लेकिन इसका समाधान वो किस तरह करेंगे ये किसी को पता नहीं है।




