Jharkhand Life News रांची: झारखंड हाई कोर्ट ने जमीन के मालिकाना हक, दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) और जमाबंदी को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि दाखिल-खारिज, जमाबंदी या लगान रसीद किसी भी व्यक्ति के मालिकाना हक का कानूनी प्रमाण नहीं हैं। ये केवल राजस्व रिकॉर्ड हैं, जबकि जमीन के असली मालिक का फैसला केवल सिविल कोर्ट ही कर सकती है।
चीफ जस्टिस एम. एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने यह फैसला हजारीबाग जिले की एक जमीन से जुड़े विवाद की सुनवाई के दौरान दिया। अदालत ने कहा कि वर्षों पुरानी जमाबंदी को अंचलाधिकारी (CO) या अन्य राजस्व अधिकारी अपनी मर्जी से रद्द नहीं कर सकते। यदि किसी जमीन पर दो पक्ष मालिकाना हक का दावा करते हैं, तो उसका फैसला केवल सिविल कोर्ट करेगी।
हाई कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि किसी व्यक्ति के पास जमीन की वैध रजिस्ट्री है और उसका जमीन पर कब्जा है, तो सिर्फ म्यूटेशन रिकॉर्ड में गड़बड़ी होने के आधार पर उसे बेदखल नहीं किया जा सकता। साथ ही, जब तक किसी सक्षम अदालत का आदेश न हो, तब तक राजस्व अधिकारियों को संबंधित व्यक्ति से लगान लेना और रसीद जारी करना होगा।
इस फैसले को जमीन मालिकों और खरीदारों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। इससे राजस्व कार्यालयों में होने वाली मनमानी पर रोक लगेगी और जमीन विवादों में कानूनी प्रक्रिया अधिक स्पष्ट होगी।




