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काहिल कांग्रेस और कोक्रोच…

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देश के लोकतांत्रिक ढांचे को पहली बार बड़ा खतरा 1975 में इमरजेंसी के दौरान पैदा हुआ था। तब जनसंघ एक पुरानी और बड़ी राजनीतिक शक्ति था। जनसंघ ने पुराने कांग्रेस और समाजवादियों के साथ खुद को विलीन कर लिया। कांग्रेस से लड़ने के लिए ऐसी पार्टियों के विलय से जनता पार्टी बनी जिनमें कोई वैचारिक साम्य नहीं था लेकिन उन्हें लगा कि ऐसा करना तात्कालिक राजनीतिक जरूरत है।

1989 तक राजीव गांधी की सरकार अच्छी भली चल रही थी। 1980 में गांधीवादी समाजवाद को आगे बढ़ाने का दावा करने के साथ बनी भारतीय जनता पार्टी नाकाम होने के बाद सांप्रादायिकता का रास्ता पकड़ चुकी थी। बोफोर्स का बोतल जिन्न से बाहर निकला तो बीजेपी ने समाजवादियों से हाथ मिलाया।

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वी.पी.सिंह की सरकार को एक तरफ घनघोर सांप्रादायिक बीजेपी और दूसरी तरफ वाम दलों ने समर्थन दिया ताकि कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया जा सके। वी.पी.सरकार के दौरान कश्मीर घाटी से पंडितों का पलायन हुआ। लेकिन यहां मुद्दा ये नहीं है।

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के पास इतिहास के अनुभव थे। अब सवाल ये है कि जब कांग्रेस के खिलाफ विचारधारा छोड़कर जब तमाम दल लामबंद हो सकते थे तो फिर कांग्रेस ने विपक्षी एकता के लिए एक बार भी ऐसी कोशिश क्यों नहीं की?

कांग्रेस का अध्यक्ष रहते हुए राहुल गांधी ने 2019 के चुनाव के ठीक पहले यह बात कई बार दोहराई कि अगर इस बार भी बीजेपी जीती तो आगे इस देश में चुनाव नहीं होंगे। उनका अनुमान बहुत हद तक ठीक था। देश उसी रास्ते पर बढ़ रहा है।

अब सवाल ये है कि सब कुछ जानते हुए कांग्रेस ने विपक्षी एकता को मजबूत करने के लिए क्या किया? अगर कांग्रेस खुद से टूटकर अलग हुए सभी दलों को एक साथ आने को कहती तो परिणाम कुछ और हो सकता था।

राहुल गांधी की निजी अच्छाइयां और उनका संघर्ष उन सवालों को लगातार ढंकता आया है, जो कांग्रेस पार्टी से पूछे जाने चाहिए। आप देश की सबसे पुरानी पार्टी है। फिर भी देश और संविधान को बचाये रखने का कोई रोडमैप आपके पास क्यों नहीं है? रणनीतिक समझौते और सड़क पर संघर्ष क्यों नहीं दिखता है?

कॉरपोरेट पोषित फासीवाद भारतीय राजनीति का जितना बड़ा सच है, उतना ही बड़ा सच कांग्रेस का निकम्मापन भी है। मुंबई में जहां मेरा दफ्तर है, उसके ठीक पड़ोस में प्रदेश कांग्रेस कमेटी का दफ्तर है। एक बार जिज्ञासा में अंदर चला गया। नज़ारा किसी बंद पड़ी पुरानी मिल की तरह था। इक्का-दुक्का लोग नज़र आये और वो पचास साल से उपर वाले।

आप अपने राज्यों में पता कीजियेगा कमोबेश ऐसी स्थिति हर जगह दिखाई देगी। राहुल गांधी हाथ में संविधान लेकर घूम रहे हैं और रैलियां कर रहे है। क्या आपने किसी और कांग्रेसी नेता को ऐसा करते हुए देखा है? दूसरी तरफ वो पार्टी है, जिसका नेता फंसता है तो उसके लाखों नेता और कार्यकर्ता ‘मैं भी चौकीदार’ का टी शर्ट पहनकर सड़क पर निकल आते हैं।

राजनीतिक बदलाव किसी एक नेता की ब्रांडिंग और उसके भाषणों से नहीं आता है। इसके पीछे संगठन की ताकत होती है। कांग्रेस एक तरह से संगठन शून्य पार्टी है। दूसरी तीसरी या चौथी पंक्ति पूरी तरह गायब है। उससे बहुत बेहतर स्थिति समाजवादी पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों की है। हर जिले में आपको एक-दो ऐसे नेता जरूर मिल जाएंगे जिन्हें लोग ठीक से पहचानते हैं।

कांग्रेस अपनी आंतरिक लड़ाइयां नहीं सुलझा पा रही है। कर्नाटक में डी.के.शिवकुमार ने पार्टी अब तक इसलिए नहीं तीड़ी क्योंकि वो गांधी परिवार के पुराने वफादार हैं। सचिन पायलट के पास थोड़े बहुत विधायक होते तो आज राजस्थान में एक अलग क्षेत्रीय दल होता और कांग्रेस के वोट काट रहा होता। कमोबेश हर जगह यही स्थिति है।

कांग्रेस टी-20 क्रिकेट की वह बल्लेबाज़ है जो शुरू के पांच बॉल डॉट खेल रही है और छठी गेंद पर सिंगल ले रही है। यानी ना जीतूंगा ना जीतने दूंगा। बेशक राहुल गांधी विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा और इस देश में निर्भीकता का सबसे बड़ा प्रतीक है लेकिन साम-दाम दंड भेद से लैस भाजपा जैसी पार्टी के खिलाफ कामयाब होने के लिए क्या इतना होना ही काफी है?

अगर केजरीवाल एक्सपोज़ नहीं हुए होते वो इस समय विपक्ष की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा होते। देश कांग्रेस से बार-बार नाउम्मीद होता है लेकिन उसी की तरफ देखने को विवश होता है। कोक्रोच पार्टी को लेकर सोशल मीडिया पर दिखा उत्साह यह बता रहा है कि देश बदलाव के लिए कितना बेचैन है और हर संभव विकल्प ढूंढ रहा है।

राहुल गांधी को यह समझना होगा कि उनकी राजनीतिक भविष्यवाणियां कितनी भी सटीक हों वो देश के लिए किसी काम की नहीं हैं, अगर कांग्रेस अपने भीतर सांगठनिक बदलाव नहीं लाता और विपक्षी एकता को मजबूत करके सामूहिक लड़ाई नहीं लड़ पाता।

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राकेश कायस्थ
राकेश कायस्थ
Media professional by occupation writer by heart

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