मानव शरीर विकास की अंतिम अवस्था नहीं है, बल्कि एक सुपरमैन या अतिमानस मानव बनने की ओर एक संक्रमणकालीन कदम है।
श्री माँ (मीरा अल्फासा) जो महर्षि अरबिंद घोष की आध्यात्मिक सहचरी थीं, के अनुसार योग का अंतिम लक्ष्य केवल आत्मा की मुक्ति नहीं, बल्कि शरीर की कोशिकाओं का रूपांतरण है। उनका मानना था कि यदि दिव्य चेतना को भौतिक शरीर की सबसे छोटी इकाई यानी कोशिका तक उतार दिया जाए, तो मृत्यु, बीमारी और बुढ़ापे पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
श्री माँ का कहना था कि हमारी कोशिकाओं की अपनी एक स्वतंत्र बुद्धिमत्ता होती है। सामान्यतः यह चेतना सुप्त होती है और केवल आनुवंशिकता या आदतों से संचालित होती है। कोशिकीय योग के माध्यम से इन कोशिकाओं को जगाया जा सकता है ताकि वे सीधे परम सत्य के निर्देश ग्रहण कर सकें।
इसके लिए हमें कोशिकाओं के मन और प्राणिक मन के बीच अंतर को समझना होगा। जैसाकि हम सब जानते हैं कि बौद्धिक मन विचारों से चलता है लेकिन कोशिकाओं का मन शरीर की वह भौतिक स्मृति है जो अनैच्छिक क्रियाओं (जैसे धड़कन या घाव का भरना) को नियंत्रित करती है। कोशिकाओं का यह मन बहुत ही जिद्दी और आदतों का गुलाम होता है, लेकिन यदि इसे प्रशिक्षित किया जाए, तो यह दिव्य शक्ति को धारण करने का सबसे ठोस माध्यम बन जाता है।
अरबिंदो और श्री माँ के दर्शन में कोशिकाओं की अभीप्सा शारीरिक रूपांतरण का सबसे सूक्ष्म और क्रांतिकारी स्तर है।
आमतौर पर हम अभीप्सा या पुकार को मन या हृदय की वस्तु मानते हैं, लेकिन यहाँ बात शरीर के उस हिस्से की हो रही है जिसे हम जड़ या अचेतन समझते हैं। श्री अरबिंदो कहते हैं कि हमारी हर कोशिका के भीतर एक अपनी बुद्धि और चेतना है। सामान्यत यह चेतना जड़ता , रोग और मृत्यु के नियमों से बंधी होती है। जब साधना गहरी होती है, तो शरीर की कोशिकाएं अपनी यांत्रिक पुनरावृत्ति से थकने लगती हैं। उनके भीतर से एक मौन प्रार्थना उठती है—प्रकाश के लिए, अमरता के लिए, और उस दिव्य उपस्थिति के लिए जिसे वे अब तक केवल बाहर खोजती थीं। कोशिकाओं के भीतर का अंधकार या जड़ता ही रोगों का कारण है। जब कोशिकाएं मंत्र या ध्यान के प्रति प्रतिक्रिया देना शुरू करती हैं, तो वे अपनी पुरानी आदतों (जैसे मृत्यु की अनिवार्यता को स्वीकार करना) को छोड़ देती हैं। इस प्रक्रिया में शरीर के भीतर के कंपन (स्पंदन) बदल जाते हैं।
कोशिकाएं प्रकाश और शक्ति को सोखने लगती हैं, जिससे भौतिक पदार्थ का स्वरूप बदलने लगता है। कोशिकाएं जब सचेत होती हैं, तो वे परमात्मा को सीधे अपने भीतर अनुभव करने लगती हैं। श्री माँ ने अपने अनुभवों में बताया था कि कैसे शरीर की कोशिकाएं नमो नमः या ॐ का जप करने लगती हैं।
कोशिकाओं की यह पुकार ही वह आधार है जिस पर अतिमानसिक शक्ति उतरती है। जब कोशिकाएं स्वयं प्रकाश की मांग करती हैं, तभी शरीर से मृत्यु और क्षय के नियम हटने शुरू होते हैं।
कोशिकाएं तकनीकी रूप से अमर हो सकती हैं यदि वे निरंतर नवीनीकरण की क्षमता विकसित कर लें। मृत्यु केवल एक बुरी आदत है जिसे शरीर की कोशिकाओं ने सदियों से सीख रखा है। यदि कोशिकाओं को यह सिखा दिया जाए कि वे केवल परम चेतना से ऊर्जा लें, तो क्षय की प्रक्रिया रुक सकती है।
अमरता का अर्थ वर्तमान बूढ़े शरीर को अनंत काल तक खींचना नहीं है। बल्कि शरीर में ऐसा लचीलापन पैदा करना है कि वह अपनी इच्छानुसार रूप बदल सके। भोजन और सांस लेने जैसी बाहरी निर्भरताओं का खत्म किया जा सके और शरीर सीधे ब्रह्मांडीय ऊर्जा से शक्ति प्राप्त कर सके।
श्री माँ का मानना था कि अगर एक भी शरीर की कोशिकाएं पूर्ण रूप से रूपांतरित हो जाएं, तो यह पूरी पृथ्वी के विकास की दिशा बदल सकता है। लेकिन ये सुनने में जितना आसान लगता है उतना है नहीं। यह कार्य एक घने जंगल में रास्ता बनाने जैसा है जहाँ पहले कोई नहीं गया। उन्होंने अपनी कोशिकाओं को प्रयोगशाला बनाया ताकि भविष्य में मानव जाति के लिए दिव्य देह प्राप्त करना आसान हो सके



