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धर्म का बाज़ार और डिजिटल मायाजाल

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धर्म जब बाजार बन जाए और आस्था उत्पाद, तो समझ लीजिए कि समाज की वैचारिक नींव में घुन लग चुका है। आज के समय में धर्म की व्याख्या वे लोग कर रहे हैं, जिनका अध्यात्म से उतना ही लेना-देना है जितना रेगिस्तान का बारिश से।
​आजकल धर्म किसी गुफा या शांत मंदिर की साधना नहीं, बल्कि चमक-धमक वाला एक बड़ा मॉल बन गया है। जहाँ शांति मिलनी चाहिए थी, वहाँ ब्रांडिंग का शोर है। अधार्मिक लोग, जिन्हें न शास्त्रों की मर्यादा का ज्ञान है और न ही मानवता का बोध, वे धर्म के नाम पर फ्रेंचाइजी चला रहे हैं। उनके लिए भक्त एक कंज्यूमर (उपभोक्ता) मात्र है।
​सबसे बड़ा मजाक तो यह है कि जो लोग सबसे अधिक अधार्मिक कृत्य—द्वेष फैलाना, झूठ बोलना और व्यापार करना—कर रहे हैं, वही धर्म के सबसे बड़े ठेकेदार बने बैठे हैं।
​मोक्ष के पैकेट बिक रहे हैं।
ईश्वर से प्रेम करना सिखाने के बजाय, ईश्वर का डर दिखाकर अपनी तिजोरियाँ भरी जा रही हैं।
​तिलक, माला और नारों को ढाल बनाकर असली धार्मिक मूल्यों (करुणा, सत्य, अस्तेय) की हत्या की जा रही है।
​हरिशंकर परसाई की दृष्टि से देखें तो…
​अगर आज परसाई जी होते, तो शायद कहते कि—धर्म अब वह अफीम नहीं रहा जिसे पीकर आदमी सो जाता था, अब यह वह तेजाब है जिसे पिलाकर आदमी को जगाया जाता है ताकि वह दूसरे का घर जला सके। परसाई जी के पात्र आज जीवित होते तो वे किसी सत्संग के पंडाल के पीछे बैठकर चंदे की रसीदें काट रहे होते और मुक्ति का डिस्काउंट कूपन बाँट रहे होते।
​यह कितनी अजीब बात है कि जिस धर्म का मूल त्याग था, उसके नाम पर संग्रह का खेल चल रहा है। जो धर्म अहंकार मिटाने के लिए था, आज उसी के नाम पर सबसे बड़े अहंकारी तैयार हो रहे हैं।
तकनीक ने जहाँ दुनिया को जोड़ा, वहीं इन धर्म के व्यापारियों को एक ऐसा हथियार दे दिया है जिससे वे सत्य की हत्या बड़ी सफाई से कर रहे हैं।
​सोशल मीडिया और डीपफेक के इस दौर में धर्म का बाजार अब और भी खतरनाक गर्त में गिर चुका है।
अब किसी संत या महापुरुष के मुंह से वो बातें कहलवाना बहुत आसान हो गया है जो उन्होंने कभी सोची भी नहीं होंगी। डीपफेक के जरिए फर्जी वीडियो बनाकर विद्वेषपूर्ण भाषण को ईश्वरीय आदेश की तरह पेश किया जा रहा है।
​चमत्कारों के झूठे वीडियो बनाकर भोली-जनता की आस्था को कैश कराया जा रहा है।
​पुरानी फुटेज को तकनीक से बदलकर इतिहास और धर्मग्रंथों की व्याख्या अपनी सुविधानुसार की जा रही है।
​सोशल मीडिया के एल्गोरिदम को सत्य से कोई सरोकार नहीं है, उसे मतलब है सिर्फ इंगेजमेंट से। आप जितना उग्र और विवादित बोलेंगे, तकनीक आपको उतना ही बड़ा मसीहा बनाकर दिखाएगी। इससे हुआ यह है कि गंभीर और विद्वान लोग हाशिए पर चले गए हैं।
​ऊपर-ऊपर से धर्म का चोगा ओढ़े रील-धर्मी लोग सबसे ज्यादा प्रभावशाली हो गए हैं।
​सत्य अब वह नहीं है जो तर्कसंगत है, बल्कि वह है जो सबसे ज्यादा शेयर किया जा रहा है।
​धर्म अब आंतरिक चिंतन की वस्तु न रहकर डिस्प्ले की वस्तु बन गया है। सोशल मीडिया पर धर्म को एक इवेंट बना दिया गया है। लाइक और कमेंट की भूख ने लोगों को इस कदर अंधा कर दिया है कि वे धर्म की मर्यादा भूलकर कैमरों के सामने नौटंकी करने से भी नहीं चूकते।
​सबसे बड़ा संकट यह है कि आम आदमी की विवेक शक्ति खत्म हो रही है। जब स्क्रीन पर साक्षात किसी पूजनीय व्यक्तित्व को कुछ बोलते देखा जाता है, तो साधारण भक्त यह समझ ही नहीं पाता कि यह एआई का कमाल है या सच। इसी भ्रम का फायदा ये अधार्मिक लोग उठा रहे हैं।
​श्रीलाल शुक्ल जी की राग दरबारी के लहजे में कहें तो, अब धर्म वह नहीं रहा जो मंदिर या मन में रहता था, अब धर्म वह है जो आपके मोबाइल के नोटिफिकेशन में सबसे ऊपर चमकता है और जिसका डेटा पैक सबसे ज्यादा महंगा है।
अगर हम और हमारी आने वाली पीढ़ी इस डिजिटल मायाजाल को नहीं समझेगी, तो विवेक की बलि चढ़ती रहेगी। सिर्फ यह जान लेना काफी नहीं कि फोन कैसे चलता है, बल्कि यह जानना भी जरूरी है कि सूचना और सत्य में क्या अंतर है। जिस तरह हम मिलावटी सामान की पहचान करना सीखते हैं, उसी तरह धर्म के नाम पर परोसे जा रहे कंटेंट की शुद्धता की जाँच करना भी सीखना होगा। ​धर्म का बाजार हमेशा शोर मचाता है, जबकि अध्यात्म मौन में फलता-फूलता है। हमें यह समझना होगा कि जो जितना ज्यादा कैमरे के सामने चिल्ला रहा है, वह उतना ही सत्य से दूर हो सकता है। धर्म प्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्म-दर्शन है।
सवाल उठता है बीफ फेक को कैसे पहचानें?
डीपफेक वीडियो को पहचानने के कुछ प्रमुख तरीके निम्नलिखित हैं:
​पलकों का झपकना: शुरुआती दौर के डीपफेक में इंसान की पलकें नहीं झपकती थीं। अब तकनीक सुधरी है, लेकिन फिर भी पलक झपकने की गति या तो बहुत तेज होगी या बिल्कुल अप्राकृतिक ।
आंखों की चमक: असली इंसान की आंखों में रोशनी का परावर्तन होता है। डीपफेक में अक्सर आंखें सपाट या निर्जीव दिखती हैं।
​मुंह के अंदर की बनावट: गौर से देखें कि जब व्यक्ति बोल रहा है, तो क्या उसके दांत और जीभ साफ दिख रहे हैं? डीपफेक अक्सर दांतों और जीभ के मूवमेंट को सही ढंग से रेंडर नहीं कर पाता, वहां अक्सर धुंधलापन होता है।
ग्लास और आभूषण: अगर व्यक्ति ने चश्मा पहना है, तो उस पर पड़ने वाली रोशनी क्या चेहरे के मूवमेंट के साथ बदल रही है? डीपफेक में चश्मे का ‘ग्लैयर’ अक्सर स्थिर रहता है।
छाया: नाक के नीचे या गर्दन पर पड़ने वाली छाया अगर चेहरे की हरकत के साथ मेल नहीं खा रही, तो समझ लीजिए वह वीडियो फेक है।
​चेहरा और बाल: गौर से देखिए कि चेहरे की त्वचा और बालों के बीच की रेखा स्पष्ट है या नहीं। डीपफेक में अक्सर कान, बाल और ठुड्डी के पास का हिस्सा बैकग्राउंड के साथ थोड़ा मिक्स या धुंधला नजर आता है।
गर्दन और कॉलर: अक्सर चेहरा किसी और का होता है और शरीर किसी और का। ऐसे में गर्दन की त्वचा का रंग और चेहरे का रंग थोड़ा अलग हो सकता है।
​होठों की बनावट और बोले जा रहे शब्दों के बीच सूक्ष्म अंतर होता है। ‘प’, ‘ब’, और ‘म’ जैसे शब्दों को बोलते समय होठों का जो जुड़ाव होना चाहिए, डीपफेक उसे पूरी सटीकता से नहीं दिखा पाता।
​आजकल कुछ ऐसी वेबसाइट्स और टूल्स आ गए हैं जहाँ आप संदिग्ध वीडियो का लिंक डालकर उसकी शुद्धता जाँच सकते हैं:
Deepware Scanner: यह वीडियो को स्कैन करके बताता है कि इसमें छेड़छाड़ की गई है या नहीं।
Sensity AI: यह विशेष रूप से विजुअल मैनिपुलेशन पकड़ने के लिए जाना जाता है।
​6. सबसे अचूक तरीका: ‘कॉन्टेक्स्ट’ की जाँच
​अगर कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति अपनी विचारधारा के बिल्कुल विपरीत या बहुत ही उत्तेजक बात कह रहा है, तो तुरंत विश्वास न करें। रिवर्स इमेज सर्च का उपयोग करें और देखें कि क्या वह ओरिजिनल वीडियो किसी और विषय पर था।
जिस तरह धर्म के बाजार में असली और नकली गुरु की पहचान उनके आचरण से होती है, उसी तरह डिजिटल दुनिया में भी हमें हर चमकती हुई सूचना पर संदेह करने की आदत डालनी होगी। साथ ही भविष्य में कानूनी रूप से हर एआई जनित वीडियो पर वॉटरमार्क अनिवार्य कर देना आवश्यक होगा।

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वरुण राय
वरुण राय
विशेष संवाददाता, वरूण राय पिछले 22 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिये लेखन कार्य कर चुके हैं।

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