गीजा के पिरामिड से ऊंचा हो चुका है, नरेंद्र मोदी निर्मित ये पिरामिड जो एआई जनित इस चित्र में आपको दिखाई दे रहा है। आधुनिक विश्व के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब किसी ऐसे भूभाग पर जिसकी 100 करोड़ से ज्यादा हो, वहां झूठ का एक ऐसा व्यवस्थित तंत्र खड़ा हो जाये जिसमें सच बोलने वालों को अपनी असुरक्षा, हीनता और कुंठा का एहसास हो।
अद्भुत है ये झूठ का पिरामिड जिसके शीर्ष पर खड़ा है राजनीतिक नेतृत्व। उसके ठीक निचली कतारों पर खड़े उद्योगपति, मीडिया समूह, इंफ्लुएंसर बन चुके टीवी एंकर और बाकी ऐसे लोग जिन्हें झूठ के नये इको-सिस्टम से सबसे ज्यादा फायदा पहुंच रहा है। शीर्ष से आ रहे झूठे को यह समूह इस तरह चीख-चीखकर दुनिया को बता रहा है कि वह सच बन जाये।
पिरामिड में थोड़ा नीचे खड़े हैं वो मिडिल क्लास लोग जिन्हें निचोड़कर इस पिरामिड की नींव रखी गई है। ये लोग कह रहे हैं कि अगर मोदीजी ने कहा है कि कुछ सोचकर ही कहा होगा और जब सोचने के लिए मोदीजी स्वंय सशरीर उपस्थित हैं तो फिर उनके होते हुए हम कुछ सोचने का पाप कैसे करें? पिरामिड की सबसे निचली कतार पर जो लोग दिखाई दे रहे हैं, वो यही कह रहे हैं कि हमारे लिए तो पांच किलो मुफ्त का अनाज ही सच है। हम तो अनाज देने वाले को सच्चा बाकी सबको झूठा मानेंगे।
दुनिया भर में यही माना जाता है कि कोई राजनीतिक तंत्र ऐसे झूठ फैला सकता है, जिसमें थोड़ा ग्रे एरिया हो। लेकिन भारत का मामला इतना अनोखा है कि आंख के सामने हुई घटना को झूठा बनाया जा सकता है और जो कहीं नहीं है, उसे सच साबित करके न्यायलय से भी उसका सत्यापन करवाया जा सकता है। भावी पीढ़ियों को नरेंद्र मोदी के झूठ के पिरामिड को समझने के लिए बरसों-बरस शोध करना पड़ेगा।




