परशुराम जयंती पर विजय सिन्हा का रोड-शो सीधे तौर पर दिल्ली को यह संदेश देने की कोशिश है कि उन्हें हल्के में न लिया जाए। मई के पहले सप्ताह में होने वाले कैबिनेट विस्तार से पहले विजय सिन्हा अपनी उपयोगिता साबित कर रहे हैं।विजय सिन्हा शायद यह जानते हैं कि अगर वे आज चुप बैठ गए, तो उन्हें हाशिये पर धकेलना आसान हो जाएगा। इसलिए वे उस ईगो को स्वाभिमान का नाम देकर सड़कों पर उतरे हैं।
भाजपा को पता है कि ब्राह्मण-भूमिहार समाज में कोई एक सर्वमान्य संगठन नहीं है। इसी बिखराव का लाभ उठाकर वे नेतृत्व की नई पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो पिछड़ा- अति-पिछड़ा थीम पर आधारित है।भाजपा नेतृत्व को यह भी पता है कि तेजस्वी यादव या किसी अन्य विकल्प के प्रति इस समाज का ऐतिहासिक प्रतिरोध उन्हें भाजपा के पाले में ही रखेगा, चाहे वे मन ही मन कितने भी दुखी क्यों न हों।

हाल ही में विजय सिन्हा ने राजस्व अधिकारियों के खिलाफ बेहद कड़ा रुख अपनाया था। उन्होंने खुलेआम कहा था कि विभाग के कुछ अधिकारी भू-माफियाओं के एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं। इस बयान के बाद बिहार रेवेन्यू सर्विस एसोसिएशन ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया था जब कोई मंत्री तंत्र के भीतर की मलाई खाने वाले सिंडिकेट पर चोट करता है, तो वह सिंडिकेट (भ्रष्टाचारी) उसे हटवाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देता है।इस आशंका में काफी दम है कि यह लॉबी विजय सिन्हा को इस विभाग से हटवाने के लिए शीर्ष नेतृत्व पर दबाव बना रही है। एक और बात है कि राजस्व विभाग सीधे तौर पर जमीन और आम आदमी से जुड़ा है। बिहार जैसे राज्य में जमीन के झगड़े और सर्वे का काम राजनीतिक प्रभाव का बड़ा जरिया होता है। भ्रष्ट तत्वों के लिए विजय सिन्हा की ज़ीरो टॉलरेंस की छवि एक बड़ी बाधा है। यदि आगामी मई 2026 के कैबिनेट विस्तार में उनसे यह विभाग लिया जाता है, तो जनता में यही संदेश जाएगा कि भ्रष्टाचारी लॉबी की जीत हुई है।
नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पास फिलहाल गृह विभाग है। राजनीति में यह माना जाता है कि मुख्यमंत्री अपने सबसे भरोसेमंद व्यक्ति को ही राजस्व जैसा महत्वपूर्ण विभाग देना चाहते हैं। अगर विजय सिन्हा इस विभाग में अपनी पकड़ मजबूत रखते हैं, तो यह सीधे तौर पर मुख्यमंत्री के एकछत्र राज के लिए एक चुनौती बन सकता है। ऐसे में भ्रष्टाचार का बहाना बनाकर या विभागीय विवादों का हवाला देकर उनसे यह पोर्टफोलियो छीना जा सकता है।
मोदीजी हमेशा साफ-सुथरी छवि की बात करते हैं, लेकिन बिहार के जटिल जातीय समीकरणों में व्यावहारिक राजनीति के नाम पर समझौतों का खेल भी होता आया है। यदि विजय सिन्हा को इस विभाग से हटाया गया, तो भूमिहार समाज इसे अपने नेता के अपमान के साथ-साथ भ्रष्टाचार के आगे घुटने टेकने के रूप में भी देखेगा।
परशुराम जयंती के अवसर पर रोड-शो शायद इसीलिए था—ताकि यह बताया जा सके कि अगर भ्रष्टाचारियों की चली और विभाग छीना गया, तो उसका राजनीतिक नुकसान केवल विजय सिन्हा को नहीं, बल्कि पूरी भाजपा को उठाना पड़ेगा।
विजय सिन्हा ने हाल के दिनों में राजस्व विभाग के जरिए इस समाज की एक बहुत पुरानी मांग (राजस्व दस्तावेजों में भूमिहार की जगह भूमिहार ब्राह्मण दर्ज करने की व्यवस्था) पर कड़ा रुख अपनाया था और दाखिल खारिज आदि के कठिन कार्य को सुगम बनाने की कोशिश की थी। इससे उन्होंने ना सिर्फ अपनी जाति के भीतर एक रक्षक की छवि बनाई है बल्कि सभी वर्गों के किसानों में अपनी अच्छी इमेज स्थापित की है।
सवाल यह है कि क्या यह समाज केवल जातीय गौरव के नारों तक सीमित रहेगा, या विजय सिन्हा के विभाग छिनने की स्थिति में इसे सम्पूर्ण समाज का अपमान मानकर भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलेगा?
देखने वाली बात है कि भूमिहार राजनीति में अभी कोई एक ऐसा छत्रप नहीं है जिसके पीछे पूरा बिहार का सवर्ण समाज खड़ा हो जाए। इन नेताओं के आपसी ईगो के कारण सवर्ण लॉबी कभी एक ब्लॉक की तरह बार्गेनिंग नहीं कर पाती। यदि भ्रष्टाचारियों के दबाव में विजय सिन्हा का विभाग जाता है, तो संभव है कि इस समाज का एक धड़ा दुखी हो, लेकिन दूसरा धड़ा इसे सत्ता के भीतर की सामान्य हलचल मानकर शांत रह जाए।
फ्लोर टेस्ट के दौरान भाजपा नेतृत्व की नजर इस बात पर रहेगी कि विजय सिन्हा के साथ खड़े विधायक क्या कोई अघोषित दबाव बना पाते हैं। अगर सवर्ण लॉबी के विधायक एकजुट होकर आलाकमान को यह संकेत देने में सफल रहे कि विजय सिन्हा का कद घटाना अगले विधानसभा चुनावों में भारी पड़ेगा, तभी उनकी कुर्सी और विभाग सुरक्षित रह पाएंगे।




