देवी भागवत महापुराण के अनुसार, वास्तु पुरुष की उत्पत्ति और उनके स्वरूप का वर्णन अत्यंत रोचक और आध्यात्मिक महत्व रखने वाला है। मुख्य रूप से यह कथा अंधकासुर और भगवान शिव के युद्ध से जुड़ी है।
यहाँ देवी भागवत के संदर्भ में वास्तु पुरुष से जुड़ी प्रमुख बातें दी गई हैं:
1. उत्पत्ति की कथा
जब भगवान शिव और अंधकासुर के बीच भयंकर युद्ध हो रहा था, तब शिव के ललाट से पसीने की कुछ बूंदें पृथ्वी पर गिरीं। उससे एक अत्यंत विशाल और भयावह प्राणी उत्पन्न हुआ। वह इतना विशाल था कि उसने पूरे आकाश और पृथ्वी को ढक लिया। उसकी भूख शांत नहीं हो रही थी, इसलिए उसने सामने आने वाली हर वस्तु को निगलना शुरू कर दिया।
2. देवताओं द्वारा नियंत्रण
उस विशाल प्राणी (वास्तु पुरुष) से भयभीत होकर इंद्र और अन्य देवता ब्रह्मा जी की शरण में गए। ब्रह्मा जी के आदेशानुसार, सभी देवताओं ने मिलकर उस प्राणी को पकड़ लिया और उसे अधोमुख (मुंह के बल) पृथ्वी पर गिरा दिया।
जब वह गिरा, तो अलग-अलग देवताओं ने उसके शरीर के विभिन्न अंगों को दबा लिया ताकि वह उठ न सके।
जिस देवता ने वास्तु पुरुष के जिस अंग को दबाया, वे उस दिशा और स्थान के अधिपति देव बन गए।
3. ब्रह्मा जी का वरदान
जब उस प्राणी ने ब्रह्मा जी से प्रार्थना की कि इसमें मेरा क्या दोष है? तब ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दिया कि:
अब से पृथ्वी पर जो भी निर्माण कार्य (घर, मंदिर, नगर, जलाशय आदि) होगा, वहाँ तुम्हारी पूजा अनिवार्य होगी। जो व्यक्ति तुम्हारी उपेक्षा करेगा, उसे दरिद्रता और अशांति का सामना करना पड़ेगा।
वास्तु पुरुष का स्वरूप और स्थिति
वास्तु शास्त्र और देवी भागवत के अनुसार, वास्तु पुरुष की स्थिति इस प्रकार मानी गई है:
ईशान कोण : यहाँ वास्तु पुरुष का सिर होता है। यह ज्ञान और सात्विकता का स्थान है।
नैऋत्य कोण : यहाँ उनके पैर होते हैं। यह स्थायित्व का स्थान है।
मध्य भाग (ब्रह्म स्थान): उनकी नाभि और हृदय का स्थान, जिसे खाली छोड़ना शुभ माना जाता है।
अग्नि और वायव्य कोण: यहाँ उनके हाथ और शरीर के अन्य हिस्से आते हैं।
देवी भागवत के अनुसार, वास्तु पुरुष की पूजा केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि प्रकृति और ऊर्जा के साथ तालमेल बिठाने का एक मार्ग है।
अंधकासुर और भगवान शिव के युद्ध से जुड़ी क्या है कथा ?
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