आनेवाले दिनों में आपको ऐसी हेडलाइन पढ़ने को मिलेगी जो उपर लिखी है। राजनीतिक नेतृत्व को देश के आजाद होने का दावा भी सूत्रों के हवाले से करवाना पड़ेगा, खुद मुंह खोलने की हिम्मत नहीं होगी। जब आप अपने फायदे के लिए देश को बेच देते हैं तो यही होता है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड स्टोरी बता रही है कि जब कोई नैतिकता विहीन, भ्रष्ट, परम पतित राजनेता सत्ता के शीर्ष पर बैठा होता है, तो वह किस तरह देश के हर छोटे बडे संस्थान को भ्रष्ट बना देता है। डराकर और टुकड़े फेककर सबके मुंह बंद करवा देता है ताकि सच कोई ना बोल पाये।
टाइम्स ऑफ इंडिया की आज लीड स्टोरी देश को बेचे जाने की कहानी का एक बड़ा सबूत है। अमेरिका पिछले एक महीने में कई बार यह साफ कर चुका है कि भारत का प्रधानमंत्री उसके हर हुक्म को सिर झुकाकर एक फरमान की तरह स्वीकार रहा है। सरकार में हिम्मत नहीं है कि वह किसी बयान का खंडन कर दे।
अमेरिकी वित्त मंत्री ने दावा किया कि ईरान युद्ध के मद्देनज़र भारत को रूस से महीना भर के लिए पेट्रोल आयात करने की अनुमति दी गई है। यह बयान साबित करने के लिए काफी था कि नरेंद्र मोदी ने भारत को अमेरिकी उपनिवेश बना दिया है। किसी की हिम्मत नहीं हुई कि इस बयान का खंडन करे।
अब चोर मंडली की आगे की साजिशें देखिये। जब यह तय हो गया कि रूस से पेट्रोल आएगा तो गुलाम मीडिया के ज़रिये यह ढोल पिटवाना शुरू कर दिया कि हम तो अपने सारे फैसले अपने आप लेते हैं। रूस से तेल खरीदना हमने बंद नहीं किया है।
बहुत अच्छी बात है लेकिन यह खबर आपको किसी अनाम सरकारी सूत्रों के हवाले से क्यों प्लांट करवानी पड़ रही है। क्या आपने कभी ऐसा सुना है कि कोई कहे कि सूत्र बताते हैं कि ये सरकार बहुत ईमानदार है। सच ये है कि प्रधानमंत्री तो दूर पेट्रोलियम मंत्री, वाणिज्य मंत्री, वित्त मंत्री किसी में हिम्मत नहीं है कि वह अमेरिकी दावे का खंडन कर दे क्योंकि अमेरिका जो कह रहा है, वही सच है। भारत की संप्रभुता बेची जा चुकी है।
अब होगा यह कि शाम के प्राइम टाइम डिबेट में नमूना एंकर, गालीबाज प्रवक्ता और विशेषज्ञ बनाकर बिठाये गये दलाल यही खबर लहरा-लहराकर दावा करेंगे कि सरकार अपने फैसले खुद ले रही है, जो सफेद झूठ के सिवा कुछ नहीं होगा। कनपटी पर बंदूक रखकर हर नागरिक को इस झूठ को सच के रूप में स्वीकार करने को बाध्य किया जाएगा। देश इस वक्त ऐसे ही चल रहा है।
एक मीडिया हाउस के रूप में यह टाइम्स ऑफ इंडिया का दायित्व था कि वह कुछ देर के लिए ही सही अपनी रीढ़ सीधी रखे क्योंकि सवाल सीधे-सीधे देश की संप्रभुता उसकी आज़ादी का है। टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे प्रकाशन समूहों को भी यह सोचना चाहिए कि वह जो कुछ कर रही है कि वह इतिहास के पन्ने में दर्ज हो रहा है। आनेवाली पीढ़ियां आप पर सिर्फ थूक सकती हैं।



