सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना बिहार में भाजपा की अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की दशकों पुरानी महत्वाकांक्षा की पूर्ति है।
नीतीश कुमार (कुर्मी) और कोइरी (कुशवाहा) का जो समीकरण ‘लव-कुश’ कहलाता था, सम्राट चौधरी के उभार ने उसमें सेंध लगा दी है। भाजपा ने सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाकर दरअसल इसी ‘लव-कुश’ जोड़ी के ‘कुश’ (कुशवाहा) वोट बैंक को अपनी ओर मजबूती से खींचा है। चूँकि नीतीश कुमार स्वयं कुर्मी हैं, इसलिए भाजपा के लिए कुशवाहा समाज से एक सशक्त नेतृत्व खड़ा करना रणनीतिक रूप से अनिवार्य था ताकि वे नीतीश कुमार के पारंपरिक जनाधार में सेंध लगा सकें।
राजनीतिक विश्लेषक इसी कारण से सम्राट चौधरी के उदय को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं, क्योंकि उन्होंने कोइरी समाज को यह संदेश दिया कि अब वे केवल नीतीश कुमार के “जूनियर पार्टनर” नहीं हैं, बल्कि उनके पास अपना मुख्यमंत्री है।
सम्राट चौधरी की कार्यशैली नीतीश कुमार की ‘सुशासन’ वाली नरम राजनीति के उलट अधिक आक्रामक और प्रत्यक्ष है, जो भाजपा के नए ‘हिंदुत्व और जाति’ के मिश्रण में भी फिट बैठती है।
सत्ता परिवर्तन के दौरान जो ‘नाटक’ या राजनीतिक उठापटक दिखी, वह दरअसल जनता के मनोविज्ञान से खेलने का प्रयास भर था और कुछ नहीं।
सम्राट चौधरी को चुनकर भाजपा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब बिहार में ‘पिछड़ा वर्ग’ का नेतृत्व यादवों (राजद) के एकाधिकार में नहीं रहेगा।
यह बदलाव केवल एक पद के लिए नहीं था, बल्कि यह संदेश देने के लिए था कि भाजपा अब बैसाखियों (गठबंधन) के बजाय अपने स्वयं के ‘पिछड़े चेहरे’ के दम पर शासन करेगी।
बिहार अब ‘पोस्ट-नीतीश’ युग में प्रवेश कर चुका है। सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना यह दर्शाता है कि भाजपा अब जूनियर पार्टनर बनकर रहने को तैयार नहीं है। वहीं, नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना और उनके बेटे का आना यह संकेत देता है कि क्षेत्रीय दल अब विचारधारा के बजाय ‘अस्तित्व’ की लड़ाई लड़ रहे हैं।
सम्राट चौधरी: भाजपा की ‘मास्टरस्ट्रोक’ सोशल इंजीनियरिंग
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