बेशक राहुल गाँधी मौजूदा समय एक अलग किस्म का चमकता हुआ राजनीतिक ब्रांड हैं। सामाजिक न्याय को लेकर उनकी प्रतिबद्धता, क्रोनी कैपिटल्जम के खिलाफ मुहिम और देश के मुख्य विभाजक शक्ति आरएसएस के खिलाफ आर-पार की मुद्रा उन्हें एक ऐसा राजनेता बनाती है, जो इस कांबिनेशन में पहले कभी भारतीय राजनीति में दिखाई नहीं दिया।
लेकिन यह भी उतना ही सच है कि राहुल गाँधी एक संगठन क्षमता शून्य राजनेता हैं। संभवत: इस काम में उनकी कोई रुचि भी नहीं है। अगर होती तो वो भला अध्यक्ष पद क्यों छोड़ते। मूल स्वभाव के आधार पर मैं उन्हें चुनावी राजनीति के लिए मिसफिट राजनेता मानता हूं। इसके बावजूद वो कामयाब होते दिख रहे है, तो इसका सबसे बड़ा कारण उनका असाधारण साहस, लगातार पिटने के बावजूद मैदान ना छोड़ने का जज्बा और व्यक्तिगत ईमानदारी है।
भारत जोड़ों यात्रा ने राहुल गाँधी को नये रूप में परिवर्तित किया। वो गाँधी से बहुत ज्यादा प्रभावित है। लेकिन उनकी पार्टी उन्हें महात्मा गाँधी नहीं बल्कि इंदिरा गाँधी के रूप मे देखना चाहती है। राहुल को यह तय करना है कि वो क्या बनना चाहते हैं। महात्मा गाँधी और इंदिरा गाँधी वाले इस अंतर्विरोध को राहुल किस तरह पाटेगे इसी सवाल में भारत का भविष्य छिपा हुआ है।
गाँधी परिवार के पास जब सत्ता की ताकत थी, उन्होंने पूरी ठसक के साथ बड़े और बेहतर फैसले लिये। छोटे-बड़े आरोपों पर केंद्रीय मंत्रियों के इस्तीफे लिये और राज्यों के मुख्यमंत्री बदले। जगनमोहन रेड्डी जैसे गुंडे की ब्लैकमेलिंग के आगे झुकने से इनकार किया और इसकी कीमत आंध्र प्रदेश जैसा बड़ा राज्य खोकर चुकाई। सत्ता थी तो गाँधी परिवार का इकबाल था। कांग्रेस मूलत: सत्ताधारियों की पार्टी रही है। सत्ता नहीं है, इसलिए गाँधी परिवार का इकबाल भी पार्टी के भीतर पहले की तरह नहीं है।
राज्यों में क्षत्रपों के झगड़े सुलझाने में राहुल नाकाम रहे। गहलोत और पायलट के बीच की सीजफायर राजस्थान में हार के नतीजे की वजह से आई। कर्नाटक में डी.के.शिवकुमार ने गांधी परिवार की बात रख ली लेकिन कब तक अपनी महत्वाकांक्षा को नियंत्रित रख पाएंगे ये कहना कठिन है। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल ने खुद को अजेय मान लिया और भितरघात ने पार्टी को चुनाव हरवा दिया। कमोबेश यही हाल हरियाणा जैसे राज्यों में भी हुआ।
कांग्रेसियों को लग रहा है कि राहुल गांधी का करिश्मा बिहार जैसे राज्य में पार्टी में नई जान फूंक देगा। लेकिन इन राज्यों में अब भी कांग्रेस सांगठनिक तौर पर बहुत कमजोर है। यूपी-बिहार में कांग्रेस का फिलहाल एक सीमा से ज्यादा मजबूत हो पाना किसी भी तर्क के हिसाब से संभव नहीं लगता। ऐसे में बेहतर यही होगा कि राज्य के कांग्रेसी फिलहाल सब्र करें और इतना जोश में कुछ ऐसा ना कर जायें कि इसका असर गठबंधन पर पड़ने लगे।
अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव ही इस वक्त राहुल गाँधी के दो सबसे मजबूत और विश्वसनीय साझीदार हैं। अखिलेश यादव में राजनीतिक परिपक्वता थोड़ी ज्यादा है। मध्य-प्रदेश चुनाव के दौरान कमलनाथ जैसे नेताओं की उट-पटांग बयानबाजी ने जो दरार पैदा की थी, उसे अखिलेश ने कुशलता से पाट लिया और लोकसभा चुनाव में पीडीए फॉर्मूले के तहत विपक्ष को ऐतिहासिक कामयाबी दिलाने में सफल रहे। बेशक इसमें राहुल गाँधी के संविधान बचाओ कार्यक्रम का भी योगदान था। फिर भी इसमें कोई शक नहीं कि यूपी और बिहार में काँग्रेस को जूनियर पार्टनर ही रहना होगा।
राहुल गाँधी को यह भी देखना होगा कि उनकी लोकप्रियता बिहार में तेजस्वी यादव के लिए असुरक्षा की भावना पैदा ना करे। अगर ऐसा हुआ तो इसका सीधा असर चुनावी रणनीति और नतीजों पर पड़ेगा। राहुल गाँधी को संगठन के स्तर पर मजबूत टीम चाहिए। लेकिन इस दिशा में कोई खास प्रगति दिखाई नहीं दे रही है। संभवत: प्रियंका गाँधी इस मामले में राहुल से बेहतर हैं।
संगठन की शक्ति के बिना सत्ता की राजनीति में दीर्घकालिक सफलता की उम्मीद बेमानी है। संगठन के मोर्चे पर कुछ ऐसा होता फिलहाल नहीं दिख रहा है, जो काँग्रेसियों के भीतर 1989 से पहले की स्थिति लौटाने का सपना जगा सके। बेहतर यही होगा कि राहुल गाँधी एक मेंटॉर और ड्राइविंग फोर्स की भूमिका में रहें और अपने नीचे एक ऐसी मजबूत टीम तैयार करें, जो तेजी से सही राजनीतिक फैसले ले सके।