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अब शेषन,खैरनार या जस्टिस सिन्हा पैदा नहीं होंगे- पढ़िये राकेश कायस्थ का ब्लॉग….

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आपको जो तीन तस्वीरें दिखाई दे रही हैं, मुमकिन है, नई पीढ़ी के लोग उनमें से किसी को ना पहचानें। पुराने लोग शायद टी.एन. शेषन को पहचान लें, लेकिन बाकी दो को नहीं। हाँ, नाम और काम से ज़रूर परिचित होंगे। चलिये एक-एक करके बात करते हैं।

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टी एन. शेषन वो व्यक्ति थे, जिन्होंने इस देश के तमाम राजनेताओं को जूती की नोंक पर रखा और चुनाव आयोग को उस शक्तिशाली सांवैधानिक संस्था के रूप में रूपांतरित किया, जिसकी वो हकदार थी। चुनाव आयोग के दोबारा केंचुआ बन जाने के बाद शेषन अब किंवदंती के रूप में याद किये जाते हैं।

जी.एस.खैरनार महाराष्ट्र प्रदेश सेवा के अधिकारी रहे और सत्ता तंत्र से लगातार टकराते हुए देश की सबसे अमीर और भ्रष्ट म्यूनिसिपल बॉडी बीएमसी तक पहुंचे। यहां आकर उन्होंने राजनेता-बिल्डर गठजोड़ को बेनकाब करना शुरू किया तो पूरे महाराष्ट्र में भूचाल आ गया।

खैरनार मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय मंत्रियों से टकराये, झूठे मामलों में फंसाये गये, सस्पेंड हुए और फिर बाइज्जत बहाल हुए। वापसी के बाद खैरनार ने उन्हीं लोगों के अवैध निर्माण गिराने शुरु किये, जो ईमानदार खैरनार के निलंबन के मुद्दे पर चुनाव लड़कर सत्ता में आये थे।

जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा वो व्यक्ति हैं, जिनके एक फैसले ने इस देश की राजनीति बदल दी थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायधीश के तौर पर जस्टिस सिन्हा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को गैर-कानूनी करार दिया था और इस फैसले के बाद देश में इमरजेंसी लगी थी।

ब्यूरोक्रेसी और न्यायपालिका को आप सब लोग अपने-अपने तरीके से देखते आये होंगे। आप अपनी तरफ से बीसियों ऐसे नाम गिना सकते हैं, जिन्होंने सरकारी सेवा में रहते हुए सरकार को ठेंगे पर रखा और अपना काम पूरी ईमानदारी से किया।

अब मैं इससे आगे का सवाल पूछता हूं। 2014 के बाद कोई ऐसा नाम बता दीजिये जो बेशक शेषन, खैरनार या सिन्हा ना हो लेकिन उसमें उनकी थोड़ी बहुत छाया हो। मेरा दावा आप केबीसी की तरह गेम क्विट कर जाएंगे। आप कोई ऐसा नाम ढूंढ ही नहीं सकते।

खैरनार पर अचानक ईमानदार बनने का भूत सवार नहीं हुआ होगा और शेषन रातो-रात सुधारवादी नहीं बने होंगे। जस्टिस सिन्हा की ईमानदारी भी हाईकोर्ट जज बनने के पहले वही रही होगी, जो हाईकोर्ट जज बनने के बाद थी। यह संभव ही नहीं है कि कोई जिला जज अपने पेशकार से रिश्वत उगाही करवाये और हाईकोर्ट जज बनते ही सीधे प्रधानमंत्री से टकरा जाये।

कहने का सीधा मतलब ये है कि पुरानी व्यवस्था में तमाम कमियों के बावजूद ऐसे रास्ते खुले थे, जहां कोई ईमानदार व्यक्ति चाहता तो सिस्टम से टकराकर अपना काम कर सकता था और आगे भी बढ़ सकता है। राजनेताओं समेत पूरा तंत्र ईमानदार लोगों से घबराता था।

पुरानी व्यवस्था पर बुलडोजर चलाया जा चुका है। इसके मलबे में जो चीज़ें दफन हैं, उनमें ईमानदारी का इक़बाल भी शामिल है। यह इकबाल समाज के भीतर भी नहीं है, व्यवस्था की बात तो छोड़ ही दीजिये।

व्यवस्था से टकराने वाला ईमानदार व्यक्ति अब किसी का नायक नहीं है। ज़रा सोचिये यही ईमानदार आदमी नायक के रूप में लंबे समय तक हिंदी फिल्मों की कामयाबी की गारंटी क्यों हुआ करता था।

पिछले 11 साल में बनी कोई ऐसी फिल्म बताइये जिसका हीरो सिस्टम के अंदर हो और उसका विरोध करता हो और फिल्म हिट हो गई हो। अव्वल तो ऐसी फिल्में बननी बंद हो गई और बन भी जायें तो चलना मुश्किल है। ईमानदारी अब कोई जीवन मूल्य नहीं है, ठीक उसी तरह जिस अहिंसा कोई जीवन मूल्य नहीं है।

गांधी भंडार के कैलेंडर पर चर्खा लेकर स्वयं महामानव बैठ गये हैं और गांधी को स्वच्छता मिशन में लगा दिया है, ताकि धीरे-धीरे सत्य अहिंसा शब्द लोक स्मृति से गायब हो जायें।

मैं निजी तौर कुछ जिला जज़ों को जानता हूं। अकेले में बात करते हैं तो सिलसिलेवार तरीके से बताते हैं कि भ्रष्ट तंत्र किस तरह काम करता है और किनके इशारों पर जज कठपुतलियों की तरह नचाये जाते हैं। दिल्ली के एक सेशन जज मेरे दोस्त हैं। इस कदर डिप्रेशन में हैं कि नौकरी छोड़ना चाहते हैं।

कई ईमानदार पुलिस अधिकारियों को जानता हूं, जिन्होंने अपनी जिंदगी पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज जैसी पोस्टिंग में काट दी या फिर फुल टाइम कवि अथवा पेंटर हो गये।

रॉबर्ट वॉड्रा के कथित जमीन घोटाले के दौरान हीरो बने आईएसएस अधिकारी अशोक खेमका के बारे में मैंने पता करने कोशिश की तो जानकारी ये मिली कि 57 तबादलों के बाद वो गुमनामी में रिटायर हो गये हैं।

शेषन,खैरनार और सिन्हा बनने की यात्रा लंबी होती है। अब कोई इतनी लंबी यात्रा करने के लिए बचेगा ही नहीं। पहले ही या दूसरे पायदान पर रौंद दिया जाएगा।

मुझे यह कहने में अफसोस है लेकिन डर या हिचक नहीं है कि नया भारत उस सिस्टम की लाश पर खड़ा अपनी मूंछों पर ताव दे रहा है, जिसमें बहुत सी कमियों के बावजूद यह संभावना थी कि अगर कोई कोशिश करे तो अपनी सांवैधानिक या नैतिक जिम्मेदारी निभा सकता था।

मौजूदा सिस्टम विशुद्ध अपराध तंत्र है, जिसने धर्म का अजेय कवच पहन रखा है। अफसरशाही और न्यायपालिका के एक बड़े हिस्से को इसने कांट्रेक्ट किलर में बदल दिया है।

देश की एक बहुत बड़ी आबादी को यह दिखाई नहीं दे रहा है। वह परपीड़न के आनंद में मगन है। उसे इस बात का अंदाज़ा ही नहीं है कि वो अपने आनेवाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा नर्क निर्मित कर रही है, जिससे निकलने का रास्ता बेहद दुष्कर होगा।

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राकेश कायस्थ
राकेश कायस्थ
Media professional by occupation writer by heart

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