चुनाव आयोग को मोदी जी ने क्या क्या बोला था –
“जेम्स माइकल लिंगदोह, सोनिया एंटोनियो माइनो के इशारे पर काम कर रहा है”
ये वर्ष 2002 था।
गुजरात के मुख्यमंत्री भन्नाए थे। चुनाव आयोग,विधानसभा चुनाव में देरी कर रहा था। समय बीतने से, तैयार किया हुआ गर्मागर्म माहौल, ठंडा हो जाता।
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2001 में भुज भूकम्प के बाद गुजरात सरकार पर भ्रस्टाचार के गम्भीर आरोप लगे। ये आरोप विपक्ष के नही, पार्टीवालो के थे। नतीजतन में गुजरात के लोकप्रिय मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा।
केशुभाई गुजरात में भाजपा को शून्य से खड़ा करने वाले नेता थे। 1995 में जीतकर आई उनकी सरकार को, उनके ही साथी, शंकर सिंह वाघेला ने गिरा दिया था।
और तब सीताराम केसरी वाली कांग्रेस के समर्थन से सीएम बन गए। केसरी डेढ़ होशियार थे। उन्होंने वाघेला को अस्थिर किया, और कांग्रेस को खड्ड में डाल दिया।
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1999 के चुनाव में भाजपा जीती।
केशुभाई फिर सीएम बने।
पर उनकी सीएम शिप की जीवनरेखा छोटी थी। आडवाणी का एक चेला उनके पीछे पड़ गया। केशुभाई ने अटल से कहकर उसे शंट कराया, और गुजरात से बाहर करवा दिया।
लेकिन केशुभाई की कुर्सी पर नजर गड़ाए शख्स ने मुट्ठी भर विधायकों विद्रोह के लिए तैयार कराया। करप्शन के आरोप लगवाए।
दोबारा कोई वाघेला एपिसोड न हो जाये, इस डर से केंद्रीय नेतृत्व ने केशुभाई की कुर्सी की बलि ले ली।
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षड्यंत्र सफल रहा। जीवन मे कभी न पार्षद, न विधायक, न प्रशासनिक वाला बन्दा शख्स सीएम बना। ऐसा इसके पहले सिर्फ बिहार में हुआ था, जब राबड़ी देवी किचन से उठाकर शपथ लेने भेजी गई थी।
नए सीएम के आने के 6 माह के भीतर गुजरात में ऐतिहासिक दंगे हुए। यह आपदा थी, पर अवसर निकाला जा सकता था।
दंगों से से जबरजस्त ध्रुवीकरण हुआ था। वोट की फसल काटी जा सकती थी। सीएम ने चट विधानसभा भंग कराई, ताकि पट चुनाव हो।
और बड़े बहुमत से सरकार बने।
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लेकिन CEC ने चुनाव की घोषणा नही की। उनका मत था कि साम्प्रदायिक तनाव है। अभी चुनाव हिंसक हो सकते हैं।
मुख्यमंत्री सुप्रीम कोर्ट गए। समवेधानिक दांव पेंच लगाए। दलील दी कि विधानसभा के 2 सत्र के बीच 180 दिन की समय सीमा होती है, जो खत्म होने वाली है।
CEC ने कहा कि यह नियम किसी संचालित विधानसभा के लिए लागू है, भंग विधानसभा के लिए नही। कोर्ट ने CEC की सुनी। सीएम की याचिका खारिज कर दी।
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CEC का नाम था- जे एम लिंगदोह।
लिंगदोह मेघालय के “खासी” आदिवासी थे। जिला जज के बेटे थे, ब्रिलियंट, कड़क। महज 22 साल की उम्र में IAS पास की, बिहार कैडर मिला।
जल्द ही ईमानदारी, और कमजोरों के पक्ष में खड़े होने के लिए प्रसिद्ध हो गए। भूमि सुधारों नियमो के कठोर पालन ने जमींदारों को इतना नाराज किया कि तबादला हो गया। पर सत्ता से टकराव लेने की निर्भीकता बनी रही।
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1997 में, लिंगदोह भारत के तीन चुनाव आयुक्तों एक नियुक्त हुए। 2001 में वे CEC बने और 2004 तक पद पर रहे।
EC उनकी प्रथम नियुक्ति देवगौड़ा सरकार ने की, CEC अटल ने बनाया। लेकिन खिसियाये गुजरात के मुख्यमंत्री ने लिंगदोह को खूब कोसा। और उनका सम्बन्ध, तब नई नई पॉलिटिक्स में उतरी “सोनिया एंटोनियो माइनो” से जोड़ा।
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20 अगस्त, 2002 को, वडोदरा के पास बोदेली में एक सार्वजनिक सभा में, मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी CEC पर बोले।
हिन्दू वोटरों को संकेत दिया कि चुनाव आयोग उनके मनमाफिक काम नही कर रहा, क्योंकि लिंगदोह ईसाई हैं, और इटली वाली क्रिस्चियन, सोनिया के इशारे पर चल रहा है।
इतिहास में पहली बार इलेक्शन कमीशन को इस तरह से घसीटा गया।
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आगे कई बार नरेंद्र मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस, सार्वजनिक सभाओं आदि में उनका नाम नाटकीय रूप से “जेम्स माइकल लिंगदोह” बोलते। ताकि उनकी धार्मिक पृष्ठभूमि को उजागर किया जा सके।
लिंगदोह ने इसे “घटिया” और “नौकरों की गपशप” करार दिया। तब अटलजी की फटकार पर मोदी ने कहा- वाजपेयी के “दिशानिर्देशों” के बाद लिंगदोह से उनका “विवाद” खत्म हो गया।
चुनाव बाद में केंद्रीय सुरक्षा बलों की जबरजस्त मौजूदगी के बीच हुए। भाजपा को जैसी आशा थी, वैसा बहुमत तो नही आया। पर सरकार फिर भी बन गयी।
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वोटर रोल्स में गम्भीर खामियों के उजागर करने के बाद,राहुल गांधी पर, भाजपा के लोग हमले कर रहे हैं।
उन्हें एक संवैधानिक संस्था पर राहुल का हमला, अत्यंत बुरा लग रहा है। उन्हें जनता को कपड़ो से पहचाने वाले नेता का बयान याद दिलाया जाना चाहिए।
“जेम्स माइकल लिंगदोह, सोनिया एंटोनियो माइनो के इशारे पर काम कर रहा है”
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जे एम।लिंगदोह, 2004 चुनाव के थोड़े पहले रिटायर हुए। उनकी असली चुनौती, आतंक की नाक के बीच, 2002 में जम्मू कश्मीर में शांतिपूर्ण चुनाव कराना थी।
इसके लिए उन्हें 2003 में सरकारी सेवा के क्षेत्र में, अंतराष्ट्रीय स्तर का रेमन मैग्सेसे अवार्ड मिला था। भारत के किसी चुनाव आयुक्त को मिला यह सबसे बड़ा अंतराष्ट्रीय पुरस्कार है।
Reborn Manish की पोस्ट