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बंगाल का जनादेश—अस्मिता की ढाल या परिवर्तन की छटपटाहट?

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​पश्चिम बंगाल की 294 सीटों पर दो चरणों में संपन्न हुआ मतदान केवल सत्ता के चयन का माध्यम नहीं, बल्कि बंगाली सामूहिक चेतना का एक अभूतपूर्व शक्ति-प्रदर्शन बनकर उभरा है। प्रथम चरण में 93.19% और दूसरे चरण में 92.47% का भारी मतदान यह स्पष्ट करता है कि बंगाल का मतदाता इस बार किसी दुविधा में नहीं था। लेकिन सवाल यह है कि ईवीएम में दर्ज यह प्रचंड उत्साह किसके पक्ष में मुड़ेगा?
​इस चुनाव की सबसे बड़ी धुरी अस्मिता रही है। सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने इसे बंगाल की बेटी बनाम बाहरी प्रभाव के नैरेटिव में कुशलता से बदला। बंगाल का जागरूक मतदाता ऐतिहासिक रूप से अपनी स्वायत्तता को लेकर संवेदनशील रहा है। केंद्र की आक्रामक सक्रियता और जाँच एजेंसियों के पहरे ने शायद मतदाता के भीतर एक रक्षात्मक तंत्र सक्रिय कर दिया। जैसा कि बुद्धिजीवियों का मानना है, मतदाता अक्सर आभार प्रकट करने के लिए घर से नहीं निकलता, बल्कि वह अपनी चुनी हुई सरकार को बदनाम होने से बचाने या उसे पूरी तरह उखाड़ने के जुनून में निकलता है।
​विपक्ष ने भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाने की पुरजोर कोशिश की, लेकिन बंगाल के धरातल पर इसकी गूँज कुछ अलग सुनाई दी। ऐसा प्रतीत होता है कि जनता ने भ्रष्टाचार को व्यवस्था की एक स्थायी बुराई के रूप में स्वीकार कर लिया है। ऐसे में, लक्ष्मी भंडार और स्वास्थ्य साथी जैसी जमीनी कल्याणकारी योजनाएं भ्रष्टाचार के शोर पर भारी पड़ती दिखीं। मतदाता के लिए अमूर्त नैतिकता से अधिक अपनी रसोई की सुरक्षा और आर्थिक निरंतरता मायने रखती है।
​एग्जिट पोल्स ने बंगाल को एक बार फिर काँटे की टक्कर (145-155 के बीच) में खड़ा कर दिया है। हालाँकि, बंगाल का चुनावी स्वभाव कभी त्रिशंकु का नहीं रहा। 92% से अधिक का मतदान किसी एक पक्ष के पक्ष में एकतरफा स्विंग का संकेत देता है। यदि राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र के प्रति अविश्वास बढ़ा है, तो उसका सीधा लाभ ममता बनर्जी को एक सुरक्षित विकल्प के रूप में मिल सकता है।
​आज के दौर में साधारण बहुमत सरकारों के लिए एक जोखिम बन गया है, जहाँ पाला बदलने और प्रलोभनों का बाजार हमेशा सक्रिय रहता है। यदि बंगाल ने किसी एक पक्ष को प्रचंड बहुमत (170+) नहीं दिया, तो आने वाले पांच साल प्रशासनिक सुधार के बजाय विधायकों को बचाने के संघर्ष में बीत सकते हैं।
4 मई के परिणाम यह तय करेंगे कि बंगाल ने अपनी ‘विरासत’ को चुना है या वह एक नए ‘प्रयोग’ के लिए तैयार है। लेकिन एक बात साफ है—बंगाल का मतदाता किसी ‘दिल्ली के नियंत्रण’ के बजाय अपनी माटी के नेतृत्व पर अधिक भरोसा करता नजर आ रहा है। यह चुनाव परिणाम केवल एक राज्य की सत्ता तय नहीं करेगा, बल्कि यह आने वाले समय में देश की राजनीति की दिशा और ब्रांड मोदी की स्वीकार्यता का भी लिटमस टेस्ट होगा।

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वरुण राय
वरुण राय
विशेष संवाददाता, वरूण राय पिछले 22 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिये लेखन कार्य कर चुके हैं।

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