डिग्री जो देखन मैं चला..
भक्तजनों। डिग्री की महिमा अपरंपार है। सृष्टि के निर्माण से आज तक रचयिता ने लाखों करोड़ों जीव, जंतुओं और वस्तुओं की रचना की। इसमे कुछ मूर्त है, और कुछ अमूर्त..
मूर्त वह, जो आप देख, छू और महसूस कर सकते है। वह दृश्यमान है, गंदा है, आम है, निकृष्ट है।
जो नही दिखता, वह दिव्य है, दैवीय है।
डिग्री ऐसी ही वस्तु है।
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वह एक गूढ़ रहस्य है।
विश्व मे बिग बैंग और बरमूडा ट्राइएंगल का रहस्य सुलझ जाएगा। कभी तो EVM का भेद भी खुल ही जाएगा। मगर डिग्री..??
वह सृष्टि का मूल रहस्य है।
सभी वेद, पुराण, उपनिषद इस बिंदु पर मौन हैं। सूत्रों की माने कुरुक्षेत्र में पार्थ ने भी इस पॉइंट पर क्वेरी की थी।
तब समस्त गूढ़ विषयो पर खुलकर ज्ञान देने वाले, आकाश, पाताल, धरती, स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन, चंद्रयान का दर्शन करवाने वाले डिग्रीधर ने, डिग्री के दर्शन कराने से साफ इनकार कर दिया।
श्री भाजपद्गीता में साफ साफ उल्लिखित है-
यथा भूमौ पाताले च, नभसि संनादति विश्वतः
यत्किंचिद् उन्मूलति त्वं, कदापिनदर्शामिडिग्रिय:
अनुवाद: हे पार्थ। तुम धरती, पाताल और आकाश में घूम-घूमकर, जो आवाज लगा लो। जो कुछ उखाड़ना चाहो, उखाड़ लो।
परंतु मैं अपनी डिग्री कभी नहीं दिखाऊंगा।
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मध्यकाल में भी इस रहस्य को जानने के प्रयास हुए। अपनी रचनावली में कबीरदास ने उल्लेख किया है।
वे डिग्री देंखने की ख्वाहिश में तमाम जीवन गुजारने के बाद उदास होकर खुद को कोसते हैं। अपने निष्फल प्रयासों को इस प्रकार शेर में ढाला है –
डिग्री जो देखन मैं चला,
डिग्री न दिखावै कोय
क्वालिफिकेशन देखहुं आपना,
मुझसा डिग्रीहीन न कोय
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रहीम कवि का तमाम जीवन भी, डिग्रीधर की डिग्री देंखने के प्रयास में गुजरा। यहां तक कि तंग आकर, एक बार तो अकबर ने भी उन्हें अपनी डिग्री दिखा दी।
परंतु डिग्रीधर की डिग्री देंखने की आस, दिल मे लिए ही वे, अल्लाह के बिलव्ड हो गए। उनका आखरी शेर था..
रहीम उखाड़े जो मही, भुईं पाताल अकास
डिग्री दिखावै ना कभी, रखे मन महि पास।
अर्थात- रहीम कवि कहते है कि मनुष्य चाहे जो उखाड़ ले, धरती, पाताल और आकाश। मगर वो उच्च सत्तासीन अपनी अपनी डिग्री कभी नहीं दिखायेगा।
और उसे अपने मन के अश्लील ख्यालों की तरह छुपाकर रखेगा।
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आधुनिक काल मे भी इसकी कोशिश हुई। नई हिंदी के प्रथम साहित्यकार और अन्वेषक भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कोशिश की।
सूत्र बताते हैं कि एक बार वे इस रहस्य के अत्यंत करीब पहुँच गए थे। परन्तु उनके मार्ग में कोर्ट, कचहरी, यक्ष, दानव, खग, खर, मुनि, तड़ीपार सब आड़े आ गए।
वह अटेम्प्ट फ़्यूटाइल हो गया। अपनी पीड़ा उन्होंने इस छंद में व्यक्त की है।
धरती-पाताल आकाश,
सब उखड़े कई बार
कोर्ट-कचहरी देवता,
यक्ष-देव-दानव
खग-नर-मुनि- तड़ीपार
सर पटक मरे सब देखे,
डिग्रीधर की निधि न पाई,
भारतेंदु कहे गंभीर,
अबे,भारतवासी का पाई?
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इस सम्बंध में दिनकर का अपना मानना यह है कि आम मनुष्य को गूढ़ दैवीय रहस्यों को जानने का प्रयास करना नही चाहिए।
सृष्टि के उच्च ऊर्जावान, गुप्त विषयो को, जिनका सत्य झेलने का सामर्थ्य मनुष्य में नही, उससे दूर रहना उचित है।
वे डिग्रीधर की ओर से कहते है..
दो मुझे समर्थन, चन्दा दो
पर इसमे गर कोई लोचा हो
दे दो मुझको ज्ञानेश धाम
रक्खो अपनी वोटर तमाम
हम EVM चलाकर खाएंगे
पब्लिक पे असि न उठाएंगे
पर नाश मनुज पर छाता है
वह डिग्री मांगने आता है
ओरिजनल मांगने आया है
आदेश कोर्ट का लाया है??
जो जज को साध न सकता है
वो मुझे बांध कब सकता है!!
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तमाम सनातनी विचारकों से अलग, कविवर राहत इंदौरी इस विषय पर कुछ अलग विचार देते है। वे कहते है।
तूफ़ानों से आँख मिलाओ,
सैलाबों पर वार करो
यूनिवर्सिटी का चक्कर छोड़ो,
छाप के डिग्री पार करो
फूलों की दुकानें खोलो,
खुशबू का व्यापार करो
डिग्री मांगना खता हुई तो,
एक नही सौ बार करो।
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अब आप मुझे बतायें, कि डिग्री के इस एटर्नल, अनादि-अनंत प्रश्न पर, आप पूज्य दिनकर के विचारों से सहमत हैं,
या कविवर राहत के??
सच्चे भारतीय हैं, तो जवाब अवश्य दें।
और हां, इसे 11 लोगो को व्हाट्सप में समिधा की तरह डालकर, उनसे भी प्रश्न करना न भूलें।
जय जय डिग्रीधर।