अंग्रेज़ों ने आदिवासी को महज़ एक “नस्ल” माना -उन्होंनें आदिवासी समाज के धर्म ,अध्यात्म और आस्था को कभी मान्यता नहीं दी ! अंग्रेज़ की ग़ुलामी से देश मुक्त हुआ , किंतु उनके इस षड्यंत्र और मानसिकता से हम मुक्त नहीं हो पाए हैं !
अंग्रेज़ों ने ऐसा क्यों किया ?
गाय-बकरी की तरह , आदिवासी को अंग्रेजों ने मात्र“नस्ल” माना । यह उनके घमंड का प्रतीक था
किंतु हर समाज की तरह , आदिवासी समाज की भी अपनी अध्यात्मिक विश्वास , आस्था और धर्म है ! समाज की अपनी अध्यात्मिक और पारंपरिक पहचान है !
प्रकृति पूजा , पूर्वजों की पूजा , इत्यादि को “animism” , “totem” , “ethnicity” , इत्यादि , जैसे नाम दे कर – उनके पारंपरिक तथा धार्मिक धरोहर और विश्वास को अनदेखा किया गया ।
आदिवासी को “भटका” हुआ मान कर , उनमें हीन भावना भरी गई !
धार्मिक पहचान को मान्यता नहीं दे कर , आदिवासियों के धर्मांतरण का अंग्रेजों ने आधार बनाया !
धर्मांतरण करना , अंग्रेजों द्वारा समाज पर शासन करने का महज़ एक माध्यम था !
आज भी आज़ाद देश के “अंग्रेज़ों के ग़ुलाम”, गाय-बकरी की तरह आदिवासी को मात्र “नस्ल” की तरह देखते हैं , और उनके धार्मिक और अध्यात्मिक पहचान का अपमान करते हैं !
समाज के कुछ रूढ़िजन्य लोग भी इनके बहकावे में हैं ! शायद उन्हें अपनी परंपरा पर गर्व नहीं ? या फिर कोई अन्य मजबूरी ?
आख़िर कुछ “अपनों” ने ही धोखा दिया था , तभी बिरसा भगवान भी अंग्रेजों के गिरफ्त में आए थे !
समाज को याद रखना है की बिरसा भगवान अंग्रेजों के इस षड्यंत्र को समझ गए थे … इसीलिए, उन्होंनें पारंपरिक उलगुलान किया और समाज को धर्म का रास्ता दिखाया …
अंग्रेज़ की ग़ुलामी से देश मुक्त हुआ , किंतु उनके इस षड्यंत्र और मानसिकता से हम आज भी मुक्त नहीं हो पाए हैं !
अंग्रेजों के इस “आदिवासी मात्र एक नस्ल है” वाले अवधारणा का “सामाजिक बहिष्कार” करने का वक्त आ गया है
हम आदिवासी गाय-बकरी की तरह मात्र एक “नस्ल” नहीं हैं ! हमारी अपनी अध्यात्मिक और पारंपरिक पहचान है !
(pic: धार्मिक प्रथाओं में हिस्सा लेते हुए । हर आदिवासी प्रथा की अध्यात्मिक आस्था और वैज्ञानिक आधार है ।)