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राष्ट्रीय
07/12/2021 :
कैसे गिरी थी बाबरी मस्जिद: आँखों देखी लाइव रिपोर्ट
 
अडवाणी, उमा, जोशी, बाबरी से कछ दूर मंच पर आसीन थे, कार सेवकों के गुंबद पर चढ़ने तक तो वीरता का प्रदर्शन होता रहा, लेकिन मस्जिद तोड़ना शुरू हुआ तो मंच के माइक से घबराहट भरी आवाज़े सुनाई देने लगी. कुछ मिनटों में नेता लोग संयत हो पाए, लेकिन तब तक कार सेवा के लिए ग्रामीणों, शहरियों की भीड़ असंयत हो चुकी थी. उसे तब किसी नेता की ज़रूरत नहीं थी, दोपहर तक पहला गुंबद ढहा दिया गया..

5-6 दिसंबर,1992 अयोध्या... हम, रेहान किदवई और विमल वर्मा की टीम कैमरा लेकर अयोध्या पहुंची हुई थी..
तब सहारा टीवी की बुनियादी टीम थी...

बीजेपी ने कारसेवा के लिए देश भर से आमंत्रित किया था, कहा जाने लगा कि इस बार भी सांकेतिक कारसेवा की जाएगी, सरयू से एक मुट्ठी रेत ला कर जन्मभूमि परिसर में डाली  जाएगी. इस ऐलान से बटोरे गए कारसेवक भड़क उठे, बार बार सांकेतिक कारसेवा के लिए अयोध्या बुलाने का मतलब क्या है.

शिवसेना बाबरी के पीछे गुंबद गिराने का रिहर्सल पिछले कई दिनों से कर रही थी. गुंबद को कमज़ोर कर रस्सों से खींचने का भी अभ्यास किया जा चुका था, विनय कटियार के बजरंग दल और शिवसेना के बीच होड़ थी, पांच दिसंबर की देर रात को मुरली मनोहर जोशी और लालकृष्ण अडवाणी पहुंचे, बैठक से तमतमाते कटियार निकले, बड़बड़ाते हुए कि मज़ाक समझ रखा है, लोग शांत करा रहे थे.. समझ गए थे हम कि सुबह बड़ा हंगामा होने वाला है. 

सुनियोजित तरीके से अफवाह तंत्र ने काम करना शुरू कर दिया गया. बीबीसी और सहारा के पत्रकारों को तलाशना शुरू कर दिया गया. क्योंकि सुब्रत रायजी को पता चल चुका था कि मस्जिद गिरा दी जाएगी. सो उन्होंने प्यारे देशवासियो संबोधित करते हुए कौमी एकता का संदेश राष्ट्रीय सहारा में दे दिया था....इसीलिए हमने और हमारी कैमरा टीम ने वीएचपी का मीडिया पास नहीं लिया, और मानस भवन की छत पर डेरा जमा लिया,
रेहान भाई ने कैमरा संभाल लिया था, विमल वर्मा हमारे साथ थे, छत पर हूप-हूप की ध्वनि निकालते वीएचपी की वानर सेना उछलकूद मचा रही थी.  बिल्कुल सामने थी बाबरी मस्जिद, फुल फ्रेम में रिकार्डिंग शुरू थी, सबह से जमावड़ा शुरू हो गया था. 

हम लोग मानस भवन की छत पर थे, लेकिन रेहान भाई को कैमरा पोज़ीशन जंच नहीं रही थी, वो जीने की छत पर चढ़ना चाहते थे, खतरा था, हंगामा होने की सूरत में वहां से उतारना मुश्किल था, क्योंकि उस छत के लिए कोई जीना नहीं था. बेहतर शॉट लेने के लिए रेहान ऊपर चढ़ गए. वहां से शूट कर रहे थे. विमलजी का काम कारसेवकों को मैनेज करना था. उन्होंने अगल बगल के कारसेवकों से दोस्ताना  रिश्ता बना भी लिया था. थिएटर के आदमी हैं विमल, मुंबई में है इन दिनों, अपने हंसोड़ मिज़ाजी और अभिनय से लुभा लेने वाले..लेकिन ये लुभावना रिश्ता बहुत देर तक नहीं चला.. 

थोड़ी देर तक तो कार सेवकों का रैला आगे आता, लोहे की रैलिंग को हिलाता और पुलिस उन्हें पीछे खदेड़ देती, लेकिन ये नाटक ज्यादा देर नहीं चला, अचानक बाबरी के पीछे की तरफ से हमला हुआ. शिव सैनिक कूद कर मस्जिद के गुंबद पर पहुंच गए, आरएसएस ने क्षणों में भांप लिया,  स्वयं सेवक फटाफट पैंट उतार कर खाकी नेकरों में छत पर फोटो अपॉर्चुनिटी  देतेे नज़र आए. इसके बाद तो हजारों का रैला टूट पड़ा... जय श्री राम का उद्घोष.. लगातार..भयमिश्रित चीखें और जय श्री राम-जय़श्री राम का पाठ ...लाखों लोगो के मुंह से सुनना रोमांचकारी था..समंदर की गडगड़ाहट और सनसनाहट भरी आवाज़.. लग रहा था कि अब गोली चलेगी, तब गोली चलेगी...लेकिन सब शांति से हुआ...

अडवाणी, उमा, जोशी, बाबरी से कछ दूर मंच पर आसीन थे, कार सेवकों के गुंबद पर चढ़ने तक तो वीरता का प्रदर्शन होता रहा, लेकिन मस्जिद तोड़ना शुरू हुआ तो मंच के माइक से घबराहट भरी आवाज़े सुनाई देने लगी.  कुछ मिनटों में नेता लोग संयत हो पाए, लेकिन तब तक कार सेवा के लिए ग्रामीणों, शहरियों की भीड़ असंयत हो चुकी थी. उसे तब किसी नेता की ज़रूरत नहीं थी,  दोपहर तक पहला गुंबद ढहा दिया गया.. 
इसके बाद भय का माहौल और बढ़ गया.. वीएचपी, आरएसएस ने मीडिया पर  हमला करवा दिया. मार्क टुली को हमारी मानस भवन की छत पर ही धुना गया. संयोग से सुरेंद्र प्रताप सिंह जी भी ( एसपी सिंह, तब वो टेलीग्राफ में थे) हमारे साथ थे. उन्होने और दूसरे साथियों ने बचाया, तब तक जगह जगह से पत्रकारों की पिटाई के नज़ारे छत से नीचे दिखाई और सुनाई देने लगे... बीटा कैमरे ले कर आए, देशी-विदेशी मीडिया के कैमरे तोड़ दिए गए. हमले कैमरों पर थे, स्टिल या वीडियो ताकि कोई दृश्य को रिकॉर्ड ना कर सके...

 पहला गुंबद गिरते ही,.. हम लोग भी डरे, रेहान ने ऊपर से इशारों में पूछा, विमल वर्मा जी खैनी रगड़ते हुए जोश में कहने लगे- रेहान भाई, कोई संकट नहीं है, आप शूट करिए... आसपास खड़े वानरों के कान खड़े हो गए... बाबरी ढहाने के दृश्य को मुसलमान शूट कर रहा है.. !!  फिर तो विमलजी के लिए भी बेलिहाज हो गए.. हूप हूप की आवाजें निकलने लगीं.. उतर ,नीचे उतर.. हम दोनों को काटो तो खून नहीं... हम लोग रेहान को नीचे उतारने लगे..उनके उतरते ही हम तीनों की जम कर पिटाई शुरू..उस वक्त पता नहीं चल पा रहा था कि हमारा क्या होगा, हम लोग नीचे गिर पड़े थे, ऊपर से लात-घूंसे,, अचानक एसपी सिंह और उनके दूसरे पत्रकार मित्रों ने आ कर बीच बचाव किया..हम लोग नीचे ही नीचे लोगों के पैरों के नीचेे से ही जीने की तरफ सरकते हुए भागे.. कैमरा ले कर...बदहवास.. कुछ सूझ नहीं रहा था... हमारे पास पहला गुंबद गिरने की तस्वीर थी... बिल्कुल सामने मानस भवन की छत से.. हमारे लिए उस वक्त वो फुटेज जान से भी प्यारा था... 

नीचे और भयावह माहौल, कार सेवकों का तांडव जारी था.. वो तो अच्छा हुआ कि रेहान ने मीडिया का दिया कार्ड लेने की बजाय भगवा अंगौछा लेने का सुझाव दिया.. कार सेवकों के बीच से निकल कर भागते वक्त ये अंगोछा बहुत काम आया.. जहां -जहां रोके गए, हम लोग पांचजन्य टीवी की टीम बता कर निकलते रहे.. फिर भी पछुआ लिए गए...एक इमारत में घुसे, डर कर भागते वक्त वीएचपी कार्यकर्ताओं ने हमारी पहचान पूछी, हम लोगों ने बेखौफ खुद को पांचजन्य टीवी्ों    

बताया तो उन्होंने हमे अपने कार्यालय के अंदर के कमरे में रख दिया. लेकिन अभी दो गुंबद और तोड़े जाने बाकी थे... रेहान परेशान...अंदर के कमरे में एक जालियों वाला झरोखा था, लेकिन शूट करना बड़ा मुश्किल, कैमरे के लैंस और बाबरी के नजारे केे बीच लोहे की बारीक जाली.. रेहान टीवी में हमारे सीनियर थे, सो उन्होंने तरकीब निकाल ली...ऑउटफोकस-इन फोकस करके उन्होंने वहां से भी खासी तस्वीरें उतार ली...
लेकिन यहां भी देख लिए गए, यहां तो एकदम टारगेट पर थे ... मानस भवन की छत पर तो वानर थे, ये तो हिंदुत्व के योद्धा..पिटते-पिटाते,समझते-समझाते हम लोग भागे... कैमरे को हमने बैग में ठूंस लिया था,

अब कोई और ठौर नहीं था, जहां से तस्वीरें ले सके, नीचे आने पर समझ में आया कि यहां शूटिंग करने का मतलब जान से हाथ धोना है. 
बीजेपी ने बाबरी की ईंट को ही राम शिला का नाम देे दिया था, कारसेवक बाबरी तोड़ कर उसकी ईंटें उठा कर ले जा हे थे. अपनी अपनी श्रद्धा के मुताबिक कोी छोटी तो की बड़ी... दो तीन लोगों का एक समूह बड़ा सा मलबा ले जा रहा था,  

उन्होंने हमें आवाज़ दी, और जय श्री राम के नारे लगाने को कहा.. हमने नारेे लगाए.. उनसे जानकारी ली, कहां जा रहे हैं.. वगैरह वगैरह.. उन्होंने रेहान से राम शिला को भी एक तरफ पकड़ने केे कहा.. हम और विमल का हंस हंस कर बुरा हाल..उस घबराहट भरे माहौल में भी....रेहान भी कनखियों से मुस्कुरा कर राम शिला को सहारा दिए हुए थे...कुछ दूर बाद उन लोगों से निजात ली.. बहरहाल, वहां से निकल कर पैदल पैदल मीलों चलते गए.  रास्ते में भय-हिंसा की तस्वीरे दिखाई देने लगी थी. और शाम होने से पहले ही एक बड़ी आशंका के बादल घिरने लगे थे
 कई घंटे चल कर पहुंचे होटल अवध क्लार्क पहुंचे देर शाम...

यहां दिलचस्प बात ये है कि पांच दिसंबर को हम लोग अयोध्या में घूम घूम कर शूट कर रहे थे
एक इमारत की छत पर अजीत साही परख के लिए पीटूसी करते नज़र आए.. छत पर इसलिए क्योकि नीच आसपास वानर सेना घेरे हुए थी, उनका कैमरा राफे सुल्तान कर रहे थे.. तब रेहान ने भी इसी अंदाज़ में उन्हें हंसते हुए आवाज़ लगाई-राफे, राफे... लेकिन राफे टस से मस नहीं हुए... 



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